खुल गया पिंजरा उड़ गया पंछी।
मुक्त गगन मुक्त पवन मुफ्त सांसे हैं सच्ची।।
बंद पिंजरे में घुटता था दम मुक्त हुआ हर्षित है मन।
मुक्त विचरण करूं गगन में इच्छा है मेरी।।
सारी आकांक्षाएं पूरी हो मेरी।
बंधन में ना पड़े कोई ना भोगे कारागार का दुख।।
स्वच्छंद विचरण करें पाएं जीवन में सुख ही सुख।
पाना है आनंद मुक्त होना होगा दूर व्यसनों के बंधन से।।
स्वरचित मौलिक अप्रकाशित सर्वाधिकार सुरक्षित डॉ आशा श्रीवास्तव जबलपुर

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