जब ईश्वर किसी से कुछ छीन लेता है तब उसे कुछ अनमोल देता भी है। हालांकि मनुष्य खोये हुए का गम ही मनाता रहता है। जो उसे मिला है, उसकी तरफ ध्यान नहीं देता है।
ठाकुर साहब को अपनी जवानी में बेटों की चाहत थी। उनके माता पिता भी बेटों के लिये लालायित रहते थे। बेटियों को पराया धन मानते आये समाज में बेटियों के प्रति प्रेम कम था। विशेष बात यह थी कि इस बुराई में महिलाओं की सहभागिता भी बराबर थी।
ठाकुर साहब को ईश्वर ने तीन पुत्र दिये। सभी उनके सौभाग्य की तारीफ करते। बेटियों की भी आवश्यकता होती है, ऐसा कभी सोचा नहीं था। बेटे ही बुढापे का सहारा होते हैं। पुत्र ही मनुष्य को नरक से पार कराता है। पुत्र ही मृत्यु के बाद श्राद्ध और तर्पण करता है। पुत्र हीन का न तो यह लोक है और न परलोक।
लगता है कि प्राचीन धार्मिक पुस्तकों का मनुष्य मन मुताबिक अर्थ निकाल लेते हैं। यदि पुत्र ही मनुष्य को नरक से पार करता है तो फिर महाराज जनक को किसने नर्क से पार कराया। सत्य तो यही है कि मनुष्य के उत्थान और पतन का हेतु खुद उस के कर्म होते हैं। भला पुत्र के होने या न होने से नर्क का क्या संबंध।
कन्या पराया धन है। इस शव्द का आशय वह बिल्कुल नहीं है जो समझा जाता है। कन्या किसी अन्य के परिवार की आधार शिला होती है। इसलिये एक कन्या की शिक्षा पुत्र की शिक्षा से अधिक व्यापक होती है। पुत्र के बराबर शिक्षण पर कन्या का अधिकार बताया गया है। पर कन्या को अतिरिक्त में यह भी बताया जाता है कि तुम्हारे ऊपर एक परिवार को संवारने की जिम्मेदारी है। उस परिवार के प्रति कर्तव्य निभाते समय तुम्हें अपने माता पिता के परिवार को भूलना होगा। उसी परिवार को अपना परिवार मानना होगा। हालांकि युग दोष के कारण कन्याओं को आजकल ऐसी शिक्षा कम मिल रही है। इसका परिणाम टूटते परिवारों के रूप में सामने आ रहा है।
पर यथार्थ में ऐसा न होकर कन्या भेदभाव का शिकार होती रही हैं। उन्हें शिक्षण के अवसर कम ही मिले हैं। उन्हें हमेशा पुत्रों से कम संसाधन मिलते रहे हैं।
जितना आवश्यक पुत्र बताया गया है, कन्या भी उतनी ही आवश्यक बतायी गयी है। कन्या दान को यों ही सबसे बड़ा दान नहीं लिखा है। कन्या के न होने पर कन्या दान का पुण्य कैसे मिल सकता है।
उम्र के इस दौर में ठाकुर साहब अपनी स्थिति का दोष अपनी पूर्व धारणा को देते। ठीक है कि बेटा होना या बेटी का होना मनुष्य के हाथ में नहीं है। फिर भी यदि ईश्वर उन्हें एक बेटी दे देता तो कम से कम कन्या दान का पुण्य तो प्राप्त कर ही लेते। शायद उस पुण्य के बलबूते इस बृद्धावस्था में एकाकी तो न रहना पड़ता। संभव है बेटी द्वारा लगातार टोकने से बेटे भी उनकी उपेक्षा न करते। हालांकि बेटियां खुद भी माता पिता की देखभाल कर सकती है। पर अभी भी बेटी से सेवा लेने की इच्छा मन में नहीं थी। बेटियां तो खुद माता का रूप होती है। फिर माता की तो सेवा की जाती है।
गांव की हर बेटी के विवाह में कन्या दान में अच्छा भला खर्च कर अपने दोष को दूर करने का वह प्रयास करते। इस कृत्य की वैसे तो उनके समक्ष बहुत प्रशंसा होती। पर क्या गांव के लोग इससे वास्तव में प्रसन्न थे।
" हरिया की तो तीन लड़कियां हैं। उसकी लड़की की शादी में बीस हजार ठाकुर साहब ने दिये थे। शेष दोनों की शादी में भी इतना तो खर्च करेंगे ही। पर मेरी इकलौती बेटी की शादी में भी मात्र बीस हजार लगाये। पचास हजार तो लगाने चाहिये।"
" सोनू चमार की लड़की के व्याह में भी बीस हजार दे कर आये हैं। यह क्या। सभी को एक ही लाठी से हांक रहे हैं। अपनी जाति विरादरी में ज्यादा लगाना चाहिये। "
" पता नहीं ठाकुर साहब किस तरह सोचते हैं। अरे रजुआ के पास भला किस चीज की कमी है। उसके यहाॅ दस बीस हजार का भला क्या मोल। यदि ठाकुर साहब हमारी बेटी की शादी में थोड़ा और लगाते तो निश्चित ही इतनी दिक्कत नहीं आती। सही बात तो यह है कि ठाकुर साहब ने हमारे अनुमान से कम लगाया है। इसी लिये हमारी बेटी की शादी की व्यवस्था बिगड़ गयी। यदि पता होता कि वह रजुआ की बेटी की शादी के बराबर ही लगायेंगे तो पहले से व्यवस्था करके रखते। "
सच्ची बात तो यह है कि अच्छाई और बुराई हमेशा व्यक्ति के मन में होती है। जब स्वार्थ ही अच्छाई और बुराई का निर्णय करने लगे तो निश्चित ही अच्छाई को बुराई की और बुराई को अच्छाई की पदवी दी जायेगी।
यह भी दुनिया का अलग रंग है। खर्च करने बाला तो खर्च कर ही रहा है। वैसे भी उसकी कोई कानूनन या सामाजिक जिम्मेदारी तो नहीं है। पर समाज की यही हकीकत है। कभी भी किसी को संतुष्ट नहीं किया जा सकता है।
जहाँ गांव के लोग ठाकुर साहब से आर्थिक लाभ उठा रहे थे, वहीं ठाकुर साहब द्वारा धन की बर्बादी की गाथा बढा चढाकर बेटों को पहुंचा देते। हालांकि अपनी आय को कहाॅ खर्च करना है, इस विषय में उनका पूरा अधिकार था। पर दोनों बेटों की नजर में वह जिस संपत्ति को बर्बाद कर रहे हैं, उसपर उनका भी अधिकार है।
अधिकार और कर्तव्य की मीमांसा करते समय हमेशा अधिकार को खुद के पक्ष में रखा जाता है। तथा कर्तव्य को दूसरे के आधीन। बड़ी विचित्र व्यवस्था है।
विचित्र व्यवस्था यह भी है कि मनुष्य अपने सहयोगी से भी अधिक की अपेक्षा में द्वेष रखता है। वास्तव में संसार ही विचित्रता से भरा हुआ है।
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'

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