बंधन ना बांध किसी छोर का 
     मस्त मग्न हिलोर यह मन भरता
लख़ पहरे जिम्मेदारियों से भरे 
       नन्हीं उम्मीदें  न जाने कहां से पालता ।

आख़री दिन हो जैसे आज का 
         रोज़ यहीं सोच उठता भागता 
पाने को सुकून पल दो पल का
     कितनी रातें मुफ्त में बेचैनी में गुजारता।

मन मेरा नादान परिंदे सा विचरता 
    देख खूबसूरत सी डाल कांटो में भी  बसता 
मान उस बेपरवाह फ़ूल को अपना
      घायल ज़ख्म लिए  ना जीता ना मारता ।

आजादी ख्वाबों के रतजगे की खातिर 
          नीद से मुंह मोड़ जाने कहां जा बैठता 
एक बार जीने के वास्ते " राधे " उसके साथ
              हर रोज सौ सौ बार उसके लिए मरता ।

© रेणु सिंह " राधे " ✍️
कोटा राजस्थान