कश्यप ऋषि की बहुत पत्नियां थी,लेकिन मुख्य रूप से चार पत्नियों का जिक्र ज्यादा किया जाता है ,जिसमें प्रमुख हैं
दिती,अदिति, कदरू,और विनता।
दिती_से दानव
अदिति _से देवता
कदरु और विनता ने कश्यप ऋषि से अपने लिए पुत्र प्राप्ति के लिए वरदान मांगा । कदरू ने अपने लिए 1000 पुत्रों और विनता ने सिर्फ दो ही तेजस्वी पुत्रों को मांगा।
कदरु को नियत समय पर 1000 नाग पुत्रों की माता बनने का गौरव प्राप्त हुआ।जिसमें से तक्षक, वासुकी,शेषनाग प्रमुख हैं।नागों को कदरूज भी कहते हैं।
विनता को जब काफी दिनों तक मां बनने का सौभाग्य नहीं मिला तो उसने अपने दो अंडे में से एक को समय से पूर्व ही फोड़ दिया,जिससे अर्धविकसित बालक का जन्म हुआ ,उसने अपनी माता को ही शाप दिया कि वह कदरू माता की दासी बने, माता के क्षमा मांगने पर उसने कहा दूसरे अंडे से निकलने वाला उसका तेजस्वी भाई ही आपको शाप से मुक्ति दिलाएगा, और आसमान में उड़ गया बाद में वह सूर्य के सारथी अरुण के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
एक बार की बात है , कदरू और विनता में इन्द्र के घोड़े उच्चेश्रवा के पूंछ को लेकर शर्त लगी । कदरू ने पूंछ का रंग काला है ,जबकि विनता का कहना था कि रंग सफेद है।
कदरू ने अपने पुत्रों को उच्चैश्र्वा की पूंछ से लिपट जाने को कहा,जिससे उसका रंग काला दिखने लगा और विनता शर्त हार गई ,और शर्त के अनुसार उसे कदरू की दासी बनना पड़ा।
वक्त बीतते ही विनता का दूसरा अंडा फूटा और उससे प्रकट हुआ पक्षी रूपी बालक निकला ,महाभारत के आदि पर्व के अनुसार जब गरुड़ का जन्म हुआ तो उस समय उसका शरीर आग की तरह धधक रहा था।उसका आधा शरीर पुरुष का और पंख पक्षी का था।
एक बार कदरू ने गरुड़ से अपने सर्प पुत्रों को घुमाने कहा,न चाहते हुए भी वह उन्हें घुमाने ले गया। उस दिन उसने अपनी मां को दासता से मुक्त करने के लिए कहा ,तो सर्पों ने शर्त रखी यदि वह अमृत लाए तो उसकी मां को दासता से मुक्त कर दिया जाएगा।
गरुड़ ने शर्त मान ली।अमृत को देवताओं के पास से लाना बहुत ही मुश्किल कार्य था।अमृत की सुरक्षा चक्र बहुत मजबूत थी ।अमृत अग्नि चक्र से घिरा रहता था।उसके बाद था तेज तलवार की धार से घूमता हुआ चक्र,और अंत में कुछ सर्प उसकी रखवाली करते थे।
गरुड़ ने सारी बाधाओं को पार कर देवताओं से अमृत प्राप्त कर लिया,इंद्र ने उसे बताया कि सांप इसके अधिकारी नहीं है ,पर गरुड़ ने अपनी लाचारी बताई ।इंद्र ने खुश होकर गरुड़ को वरदान दिया कि ये सर्प हमेशा उसका भोजन बनेंगे।
गरुड़ अमृत लेकर पहुंचा और अपनी माता को कदरू की दासता से मुक्ति दिलाई।
इससे पहले की सर्प अमृत का सेवन करते इंद्र उनसे अमृत चुरा ले गए।
गरुड़ की ईमानदारी को देख कि अमृत कलश पास होने के बाद भी गरुड़ ने इसका सेवन नहीं किया भगवान विष्णु ने उसे अमरता का वरदान दिया ।और गरुड़ के आग्रह पर अपना वाहन बनाया।
गरुण ने नारद जी के कहने पर श्री राम ,लक्ष्मण को जब मेघनाथ ने नागपाश में जकड़ दिया था ,उससे मुक्त कराया
रामचरितमानस की ये पंक्तियां_
"खगपति सब धरि खाय माया नाग बरुथ।
माया विगत भए सब हरसे बानर जूथ।"
इन पंक्तियों में पक्षीराज गरुड़ ने जो श्री हरि खुद संसार के भवबंधन को काटते हैं,उन्हें नाग पाश से मुक्त करते हैं ,ये ईश्वर की अद्भुत माया नहीं तो और क्या है !!
महाभारत में गुरु द्रोण के चक्रव्यूह का नाम ही गरुड़ था।
गरुड़ का महामात्य इन ही बातों से पता चलता है , कि उनके नाम से ही पूरा पुराण है ।जिसे गरुड़ पुराण के नाम से जाना जाता है।
इस पुराण में गरुड़ ने भगवान विष्णु से मनुष्यों के किए गए कर्मों का मृत्यु के बाद होने वाली गति और उनका अस्तित्व उसके बारे में विस्तार से पूछा था।
गरुड़ अद्वितीय हैं माया रूपी के बंधनों को छुड़ाने वाले विष्णु प्रिय हैं।

0 टिप्पणियाँ