तेरी स्मित दंतुरित मुस्कान,
मुझमें भर देती है नई जान।।
तेरा धूल धूसरित गात, थोड़ी सफ़ेद, कुछ मटमैली मिट्टी घुटनों पर यूँ लगे,
ज्यों उतरा हो धरणी पर शिशु-शशि, काजल का छोटा दाग लिए।।
तुम तुतलाकर बोलते कभी अस्पष्ट बोली में समझाते हो,
कभी-कभी नन्हें-नन्हें हाथों से इशारों में बतियाते हो।।
तुम हो थोड़े से नटखट और थोड़े से चंचल,
तुम सुरक्षित हो जाते, थामकर मेरा आँचल।।
कभी तू मुझसे रूठ जाता है, फिर कान्हा सा मुझे सताता।
मैं यशोदा सी खिल जाती हूँ, छुपा आँचल में प्यार लुटाती।।
हाथों में तेरे पहनायी स्याह-धवल मोतियों की माला,
बुरी नज़र से बचाने को मैंने तेरे माथे पर लगाया एक टीका काला।।
दिनभर खूब शरारतें करते, कभी दीदी की चोटी को खींचते,
रात होने पर जब थक जाते, चुपके से मेरे पास सो जाते।।
कभी नींद में जब अकुलाते, कभी अपनी पलकें झपकाते,
देखूँ तुझे में हर मुस्काते, साथ मेरे तुम हर सुख-दुःख में।।
*नेहा* का नेह कुछ ऐसे बरसे,
तू यशस्वी हो आसमान में चमके।।
नेहा धामा " विजेता " बागपत , उत्तर प्रदेश

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