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लाचारी, गरीबी की मार से
मेरा नन्हा कोमल बचपन कहीं खो गया
है नहीं रहने को ठिकाना 
फुटपाथ ही अब मेरा घर हो गया।।

चाहिए था होना कन्धो पर
किताबो का झोला 
दो वक्त की रोटी का जुगाङ ही तकदीर बन गया

मुझे भी चाहिए थी कलम औरो की तरह।।
ये सपना तो बस एक सपना बनके रह गया। 

क्या जमाने की मतलबी निगाहे नहीं पङती मुझ पर 
या इंसान के अन्दर का जमीर ही मर गया।।

मुझे भी चाहिए है ममता की घनी छांव 
ईश्वर तो मुझे मेरा हक देना ही भूल गया 

मेरी आँखों में भी पलते है मासूम सपने
पेट की भूख तले सपनो का गला दब गया।।

मुझे भी खेलना है खिलौनो के संग 
किस्मत की लकीरे कुछ ऐसी गढी खुद एक खिलौना बन गया। 

तरस खाते है लोग मेरी बेबसी पर 
लेकिन स्वार्थ, मेरे लिए उनके हाथ बाँध गया। 

कूङे के ढेरो में पलता है मेरा बचपन 
मतलब परस्त जमाना मुझ पर हंसकर चैन से सो गया

मेरे नन्हे हाथ लोगों की चाकरी कर रहे 
मुकद्दर के अागे मेरी उम्मीदो पर भी अँधेरा घिर गया।।

कहते हैं बच्चे भविष्य है इस देश का….. 
और एक भ्रष्टाचारी मेरे भविष्य से ही राजनीति कर गया।।
🎄🌲🎄🪴🪴🪴स्वरचित
🌹🌹🌼🌸प्रितम वर्मा🪴🪴🪴🪴🪴🪴🪴🪴🪴