" ये जिंदगी के मेले , दुनिया में कम न होंगे 
   अफसोस     हम      ना       होंगे ।
इक दिन पड़ेगा जाना , क्या वक्त क्या जमाना 
कोई  न  साथ  देगा , सब  कुछ  यहीं  रहेगा 
जाएंगे  हम  अकेले , ये   जिंदगी  के  मेले 
होगी  यही   बहारें ,  उल्फत  की  यादगारें 
बिगड़ेगी और चलेगी , दुनिया यही रहेगी 
होंगे यहीं झमेले , ये   जिंदगी  के   मेले ।।

जी हां दोस्तों , शकील बदायूंनी के द्वारा लिखे इस गीत गीत में जिंदगी के मेले का सचित्र वर्णन किया गया है । यह सच ही तो है इंसान की जिंदगी एक मेले की तरह ही तो है जैसे मेला धीरे -  धीरे सजता है रंग- बिरंगी दुकानें , कहीं खिलौने वाला , कहीं गुब्बारे वाला , कहीं बाजे वाला , कहीं डुगडुगी बजाकर बंदर का नाच दिखाता मदारी तो कहीं पतली सी रस्सी पर चल करतब दिखाने वाली लड़की , कहीं सर्कस का शोर , कहीं झूला है गोल , कहीं चटकदार गोलगप्पे की छोटी दुकान तो कहीं मिठाई वाले बड़ी सी दुकान , कहीं रंग - बिरंगे कपड़ों की दुकान तो कहीं चटपटे  व्यंजन की दुकानें और बहुत कुछ होती है इस मेले में । चारों तरफ लोगों का शोर - शराबा , झूले पर डर कर शोर मचाते बच्चे , मम्मी - पापा से मनपसंद खिलौने खरीदने के लिए जिद करते बच्चे तो कहीं खाने की दुकान पर अपनी बारी का इंतजार करते लोग । सब अपनी - अपनी चाहत को पूरा करने में व्यस्त हैं । अपने आप में पूरी जिंदगी को समेटे कुछ घंटों का मेला हमें बहुत कुछ सीख दे जाता है । मेला में ‌आए हरेक शख्स चाहें वह दुकानदार हो या मेला देखने वाला सबको पता है कि यह मेला महज कुछ घंटों का या फिर कुछ दिनों का ही है फिर सब कुछ उजड़ जाना है ‌। ना वह जगह उसका है ना वो लोग अपने ही है जिनसे हम मेले में मिलते हैं ‌ सब क्षणिक है । इसके बावजूद भी लोग मेले में आकर कुछ घंटों के लिए ही सही पर जिंदगी की सारी खुशियां अपने में समेट लेना चाहता है । 

यही हाल इंसान की जिंदगी का भी है जैसे - जैसे हम बड़े होते हैं , रंग - बिरंगे जिंदगी के सपने देखना शुरू कर देते हैं । बड़ा बनने की चाहत में बहुत से अपने पराये हो जाते हैं और बहुत से पराये अपने हो जाते हैं । कुछ अपने सपने को साकार कर पाते हैं , कुछ सपनों को पूरा करते - करते पूरी जिंदगी बिता देता है । कुल मिलाकर कुछ पाने की चाहत में हम भूल जाते हैं कि जीना किसे कहते हैं ?? या फिर जिया कैसे जाता है ???
और फिर जिंदगी की तलाश करते - करते न जाने कब इंसान मौत के करीब आ जाता है ठीक उसी तरह इंसान अपने बुने ताने - बाने से बाहर नहीं निकल पाता जिस तरह मकड़ी अपने बुने जाल से बाहर नहीं निकल पाती । एक समय ऐसा भी आता है कि इंसान अपने हाथों से सजाएं मेले में इस तरह खो जाता है जहां से वो चाहकर भी लौट कर कभी वापस नहीं आ पाता । मेले को तो एक दिन उजड़ना ही होता है और वो उजड़ता भी है । रह जाती है तो सिर्फ उसकी रंग - बिरंगी , खट्टी - मीठी यादें । 

    दोस्तों , माना कि मेला कुछ दिन के लिए लगता है पर इसमें बुराई ही क्या है कि इसके उजड़ने की परवाह किए बगैर मेले के रंग - बिरंगी दुनिया का मजा लिया जाएं जब तक जिंदगी के मेले में रहे जी भर कर खुशियाॅं बटोरें , जी भर कर जिएं । शायद इसी का नाम जिंदगी है और यहीं जिंदगी का मेला है जहाॅं से लौट कर कोई नहीं आता ।।

" दुनिया में अगर आएं हो तो जीना ही पड़ेगा 
  जीवन है  अगर  जहर तो  पीना  ही  पड़ेगा "

                                        धन्यवाद 🙏🏻🙏🏻

         " गुॅंजन कमल " 💓💞💗