कैसे बयाँ करूँ मैं 'जख्म' ए दिल की बेचैनी????
सीने में आग ओ' आँखों में आपकी याद का पानी।

बोझिल हूँ भीतर तक परन्तु, अहसासों को गहराई तक छिपाना है.....

मालूम है अब कभी लौट कर न वापिस आओगे फिर भी,
इस दिल को चाहिए एक बहाना है।

खुद ही 'गर' मुरझा गई तो घर, बच्चों, माता- पिता कैसे
गम से बचा पाऊँगी मैं......

टूट गई हैं मेरी भी साँसें, चीर गई सिन्दूर की माँग,
दिल से खून के आँसू बह गए.....

सूनी फूलों की सेज के अरमान इस अल्हड जवानी में ही मुरझा गए .....

पलकों से जिसे न ओझल होने देते थे इक पल के लिए भी,
आज मुझे इस हाल में किसके सहारे छोड गए हो????

चाहे निर्जीव बन रहते हमेशा आँखों में काजल बनकर,
जीवन भर आपकी सेवा कर धन्य पाती खुद को.....

  आपके साथ के सहारे यह जिन्दगी तमाम गुजर जाती,
काश यह सच न होकर सपना ही हो ,
यही खैर मैं नित दिन मनाती।

शहीद की पत्नी बन अब भी मैं कृतज्ञ हो,
उस ईश्वर के चरणों में झुक जाती।

माँग का सिन्दूर कभी न मिटाऊँगी,
शहीदी के सिन्दूर के सहारे ही अब जीवन
मैं बिताऊँगी।