पांच साल की रोशनी को अपनी माॅ की बहुत धुंधली सी याद थी। दो साल की लङकी को छोङकर जब सुशीला धरती छोड़ गयी तब संतोष ने पूरा जीवन रोशनी की देखभाल में लगाने को सोच लिया। पर अक्सर कहना और करना कठिन होता है। सबसे बङी बात थी कि रोशनी खुद उम्र के उस मोङ पर थी कि वह माॅ के बारे में पूछने लगी। उसकी सहेलियों की माॅ स्कूल छोड़ने आती हैं। रोशनी की माॅ कहाॅ है। फिर घर बालों के बारबार जोर देने पर संतोष माया से दूसरी शादी को राजी हो गया। माया खुद बहुत समझदार थी। ईश्वर ने उसके साथ भी विचित्र खेल खेला था। उसका विवाह एक फौजी से हुआ था। शादी के बाद माया का पति उसके साथ रहा। फिर ड्यूटी पर चला गया। फिर कभी नहीं आया। आयी तो उसके मौत की खबर। हसने खेलने की आयु में माया विधवा हो चुकी थी। संतोष और माया दोनों की परिस्थिति एक जैसी थी। दोनों को सहारे की आवश्यकता थी। माया संतोष की पत्नी बन गयी और रोशनी की नयी माॅ भी।
थोड़ा समय तो ठीक रहा। पर दुनिया उससे ज्यादा जालिम है जितना हम समझते हैं। माया के भैया भाभी का सिखाने पढाने का दौर चला। माया की रोशनी की तरफ बेरुखी बढती गयी। संतोष को भी सिखाने पढाने बाले कम न थे। जीवन भर एक दूसरे में सहारा ढूंढने बाले एक दूसरे की कमियां गिनाने लगे। माया भी गर्भवती हुई। उसका अपना आने बाला है। फिर रोशनी और ज्यादा पराई हो गयी। रोशनी के भाई आया तो पर वह कभी भाई को गोद में न ले पाई। माया ने उसे पास भी नहीं आने दिया। दूर से भाई को देख छोटी बच्ची खुश हो जाती।
संतोष और माया के मतभेद बढते गये। दोनों को समझाने बाले बहुत थे। एक दूसरे को नीचा दिखाने के लिये कुछ भी किया जा सकता था। अब दोनों अलग अलग रह रहे थे। माया ने संतोष पर कई मुकदमे कर दिये। कानूनन जितनी संतोष की ताकत थी, उतने मुकदमे संतोष ने भी कर किये। माया का बेटा शुभ अब सात साल का था। रोशनी चौदह साल की समझदार लड़की थी। रोशनी और शुभ ने कभी एक दूसरे को देखा भी नहीं। पर माया ने कभी जिस मुकदमे का सहारा लेकर संतोष को नीचा दिखाया था, अब संतोष उसी मुकदमे से माया को नीचा दिखायेगा।
संतोष ने अदालत में प्रार्थना दी कि माया के पास मेरे बेटे का भरण पोषण करने का पर्याप्त साधन नहीं है। वह खुद के और बेटे के भरण पोषण का खर्च मुझसे मांगती है। वैसे भी अब बेटा सात साल का हो चुका है। इसलिये बेटे के हित को देखते हुए लङके का संरक्षण मुझे दे दिया जाये।
अदालत में माया की भावनाएं काम नहीं आयीं। सबूत संतोष के पक्ष में थे। शुभ का क्या हित था, यह तो पता नहीं पर संतोष ने एक ही बार में माया को बड़ा झटका दे दिया।
रोशनी बहुत बड़ी तो न थी पर समझदार ज्यादा। दूसरों के समझाने का उसपर ज्यादा असर नहीं होता। भाई को माॅ की याद में उदास देखती तो खुद उसके आंसू पोंछने लगती। शुभ उसका भाई था और सौतेला शव्द उसकी शव्दाबली में न था। कइयों ने रोशनी को सौतेला शव्द समझाना चाहा भी पर रोशनी ने नहीं समझा। अपने भाई की खुशी के लिये रोशनी ने वह कर दिया जो आज तक कोई नहीं कर पाया। बड़ों के बहकाने में भटके बड़े लोग बच्ची के समझाने से समझ गये। सब मुकदमे खत्म कर माया और संतोष साथ साथ रहने लगे । अब इस घर में कोई भी सौतेला नहीं है। रोशनी शादी होकर अपने साजन की हो चुकी है। संतोष और माया उम़ के दूसरे पड़ाव पर हैं। सौतेले भाई के प्रेम में छोटी बच्ची ने जो कर दिया, उसकी चर्चा अक्सर भी हो जाती है।
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'

0 टिप्पणियाँ