गली के आखिरी मोड़ पर, अन्दर की तरफ, रहता था, वो चाय वाला.....रोज सबेरे - सबेरे उसका ठेला चाय बनाने के सामान से सजाकर, निकल जाता था, वो चाय बेचने..
पत्नी थी -तीन बच्चे थे उसके, मोहल्ले में खेलते रहते थे, 
उसके बड़े बेटे का नाम सुहेल था, उसकी माँ प्यार से उसे 
' सुहू ' बुलाती थी, था भी बहुत होनहार.....
बच्चों को उनकी माँ ही स्कूल छोड़ने जाती थी....
चाय वाले को पता चला यहाँ, किराए से मकान खाली है, तो वो आकर -माँ से बोला -माँ जी आपके यहाँ मकान खाली है, मुझे लेना है, माँ ने कहा -बेटा एक ही कमरा है वो भी छोटा है.....
वो बोला -किराया तो कम है, हम रह लेंगे, माँ ने उसे वो कमरा, जिसमें सीढ़ी के नीचे भी जगह थी, उसे किराए से दे दिया......
चाय वाला दूसरे ही दिन अपनी पत्नी और बच्चों के साथ, सामान लेकर रहने आ गया.....
उसकी पत्नी बड़ी ही धार्मिक प्रवृत्ति की थी, बड़े सबेरे उठ कर अपने नित्य के कामों में जुट जाती थी, चाय का ठेला तैयार करने में अपने पति की मदद भी करती, फिर पूजा पाठ करके मंदिर जाती, वहाँ से आकर बच्चों का टिफिन तैयार करके उन्हें स्कूल छोड़ने जाती, आकर अपने घर के बाकी काम निपटाने में लग जाती, यही रोज की उनकी दिनचर्या थी......
चाय वाला था बहुत ही सीधा -सादा, अपने काम में ही मशगूल रहता, सुबह निकल जाता चाय बेचने, दोपहर में आता खाना खाने ,फिर निकल जाता -रात में ही लोटता, घर तो उसे ही चलाना था......
एक दिन सुबह -सुबह बड़ा हादसा हो गया - उस मकान का वही हिस्सा, जिसमे वो रहते थे - बहुत जोरों की आवाज के साथ, भरभरा कर गिरना शुरु हो गया -
आवाज इतने जोरों की थी - माँ घबरा गयीं! क्या हुआ? 
कुछ अनहोनी तो नहीं हो गयी -
दोड़कर जाकर देखा -वहाँ पर चाय वाले के घर का कोई भी नहीं था.....
ईश्वर का लाख लाख शुकर है कहते हैं न......
"जाको मार सके न सांईयां, मार सके न कोय"
कोई घटना घटित न हो पायी.....
क्यों कि -
चाय वाला चाय बेचने चला गया था....उसकी पत्नी 
आज तीनों बच्चों को स्कूल छोड़ने के बाद ,मंदिर चली गयी थी......
सुहेल की माँ ने मंदिर से लोटकर, जो देखा उसने, वो जोर जोर से रोने लगी......
हतप्रभ रह गयी वो, ये क्या हो गया? 
किसी ने जाकर चाय वाले को खबर दी, वो दोड़ा-दोड़ा आया.... वो भी देखकर घबरा गया!! बच्चे कहाँ है...?
पूछा उसने -उसकी पत्नी बोली -उन्हें तो मैं स्कूल छोड़ कर, मंदिर चली गयी थी......
वहाँ बहुत भीड़ जमा हो गयी थी -
सभी ने उन्हें ढांढ़स बंधाया -माँ बोली बेटा -ईश्वर की 
कृपा तो देखो! उस समय तुम लोग कोई भी घर पर 
नहीं थे!! जब ये हादसा हुआ......
ये  ईश्वर की कृपा ही तो है तुम सब पर कोई आंच नहीं आने दी......
फिर उन्होंने अपना सामान देखा,कुछ खास नुकसान 
नहीं हो पाया, ज्यादा सामान ही न था घर में, सीढ़ी के 
नीचे वाले हिस्से में ही जरुरत का सामान था....
वही हिस्सा बच गया था.....
सामने ही एक मकान में, उन्हें कमरा खाली मिल गया, वहीं पर उन्होंने अपना सामान रख लिया.....
फिर वही रोज की दिनचर्या शुरू हो गयी, ऐसे ही समय निकलता गया -बच्चे भी अब बड़े हो गये थे - उनकी 
अब नोकरी भी लग गयी थी.....
चाय वाले ने काफी समय पहले एक प्लाट खरीद 
लिया था......
हालांकि काफी दूर जरुर था ,पर सस्ते में मिल गया था -
बच्चों ने मिलकर उस प्लाट पर, अच्छा बड़ा मकान बनवा लिया और किरायेदार भी रख लिए.....
अब सब कुछ बदल चुका था, तीनों बेटों की शादी भी हो गयीं, घर में बहुयें भी आ गयीं, सब मिलजुल कर अच्छे से रहने लगे.....
खुशहाल परिवार की मिसाल बन गया.... वो चाय 
वाला पर वो कहाँ मानने वाला!! स्वाभिमानी जो था 
वो.... सुबह से उसकी वही दिनचर्या शुरु हो गयी!!
चाय का ठेला और वो...।

सारांश -
'संघर्ष पूर्ण जीवन ' संतोषप्रद और सादगी भरा जीवन ही सफलता की कुंजी है ।
            
कहानीकार- रजनी कटारे 
    जबलपुर (म. प्र.)