इस दुनिया की भरी भीड़ में
हर इंसान अकेला है ।
जीवन मरण का कोई ना साथी
यह दुनिया एक मेला है
सुख दुख धूप छांव से होते
कभी हंसाते कभी रुलाते
समय का पहिया गोल घूमता
दुनिया वाले समझ ना पाते
सुख बांटो तो सुखी रहोगे
दोगे दुख तो दुखी रहोगे
जैसी करनी वैसी भरनी
सच्चाई को कब समझोगे
जो बोया है वही कटेगा
कांटो से न फल निकलेगा
प्रेम और भाईचारे से
हर सवाल का हल निकलेगा
कर्मों का लेखा होता है
भाग्य नहीं सब कुछ होता है
प्रारब्धों के भोगमान से
बड़ा सत्य ना कुछ होता है
खुशियां बांटे खुशियां पाये
दुखी जनों का मान करें
आओ अपने सत्कर्मो से
जन-जन में मुस्कान भरे।
प्रीति मनीष दुबे
मण्डला (म.प्र)

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