देख असंख्य दीपों की दीपमाला
      विस्मित खड़ा घनघोर तम काला।
आज अमावस ठौर नहीं उसकी
      दीए तले छुप के डेरा उसने डाला।।

गहन तिमिर का तो यही भाव है
      रौशनी से छुपना सदा का स्वभाव है।
अपनी दीपावली विजय गाथा सी है
        हुआ विलीन वह श्याम वर्ण वाला।।

दिए तले अंधेरा" कहावत चरितार्थ न हो
      दूजे की बुराई निकाल सिद्ध स्वार्थ न हो।
दमकते रौशन चेहरे के पीछे मानव!
      क्यूं तेरे हृदय ने अंधकार को पाला।।

अबके दीपपर्व अपना ये उदाहरण हो
       एक दीप उस" के भी चौखट रौशन हो।
वह जरूरतमंद दुआएं जरूर देगा
      जिसे दिया तूने खुशी भरा निवाला।।

तंत्र मंत्र सिद्धि छोड़ अलख ये जगाते हैं
    इस पर्व मानवीयसंवेदनाओं को बुलाते हैं।
रौशन जहान हो सबका अभिमान हो
     एक मन से दूजे मन तक फैले उजाला।।

दीपों की कतारों के मध्य जगमगाती रात
       आज कुछ यूं दांव लगाने करते हैं बात।
कुछ उनको देते हैं कुछ उनसे लेते है
      उनके"आशीर्वचनों ने अबतक संभाला।।

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दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं✨
    मौलिक व स्वरचित:-
               कीर्ति रश्मि "नन्द
              वाराणसी