युगों पहले लौटे थे जब श्रीराम वन से,
मनाई तब सबने राम आगमन पर दिवाली थी।

बिछाए थे चौदह वर्ष से सभी ने उनकी राह में नयना,
सजाई थी तब फूलों से अयोध्या प्यारी थी।

देखकर दीपों की अदभुत छटा, अनुपम,
अयोध्या की सजावट स्वर्ग की रौनक पर भारी थी।

भ्रात ,सिया के साथ जब आए प्रभु लौट कर नगरी,
सभी के ह्रदय हुए पुलकित परिवार और सब नर नारी थी।

थी ममतामयी माँ व्यथित, प्रेम की थी दशा अदभुत,
भावों से भरे थे मन,स्वागत में प्रभु के गजब की तैयारी थी।

 लौटे प्रभु सारी पृथ्वी का पापियों से उद्धार करके,
 प्रभु के इस उत्तम कार्य पर उनकी सारी सृष्टि आभारी थी।

 तब से आज तक हम सब दीपावली मनाते हैं,
युगों से चली आई , सदा चलेगी यह जो प्रथा प्यारी है।

सजेगी यूं ही धरा जगमग रोशन उजालों से,रहेगी सदा,
 खुशहाली आज भी है कल भी भावना हमारी थी।

लौट आओ राम जी , फिर से  सजाया है नगर हमने ,
चाहिए फिर से वही नगरी सौहार्द वाली  जो तुम्हारी थी।

अंजू दीक्षित,
बदायूं,
उत्तर प्रदेश