प्रथम मिलन की स्मृति, ह्रदय प्रफुल्लित कर देती है ।
मन मंदिर में आज भी वह छवि हर्षित कर देती है।

तव  रूप निरख कर प्रथम बार, हृदय को आभास हुआ।
जन्मों  से हम साथी थे, अब  पुनः प्रेम मिलाप हुआ। 
 
 सौंदर्य की देवी आ रही,करने को प्रिय से अभिसार।
 कामनीय अप्रतिम सौंदर्य ,मैं रहा विमुग्ध रूप निहार।

मन वीणा में हुआ झंकार,देखा जब तुमको प्रथम बार।
तुम्हें देखता ही रह जाऊं , जी में आया  था बार-बार।

 देख मुझे तुम शरमाई थी, कुछ सकुचाई ,घबराई थी।
अति हर्षित हो संध्या ने निज ,लाली  तब बरसाई थी।

बात कुछ आगे बढ़ी तो ,तुम थोड़ी सहज हों गई थी।।
मुझे यूं प्रतीत हुआ ,ज्यों जूही की कली  झूम गई थी।

मृदुल मुस्कान  देख तेरा, मन  विवश अति हो चला था।
टेसू पुष्प समअधरों से,जब प्रिय शब्द उच्चरित हुआ था।

घनी केशों काली भौहों ने,  इस  मन को भरमाया था।
स्वप्निल अलसाई पलकों में ,सौंदर्य छंद बन छाया था।

सागर जल की गहराई में,जब प्रतिबिंब तेरा निहारा था।
मन जोरो से धड़का था, अस्फुट स्वर में तुम्हें पुकारा था।

तेरे कोमल हाथों को,जब मेरे हाथों ने स्पर्श किया।
ज्यों बिजली के तारों सा, रंध्र रंध्र  रोमांचित हुआ।

तेरे नैनो  से नैन मिले थे जब, ह्रदय मार्ग से  बात हुई ।
शब्द नहीं निज शब्द कोष में,जब बातबात में रात हुई।

तेरे कोमल हाथों ने जब,मुग्ध हो रेत के घरौंदे बनाए थे।
मेरी वीरान अंधेरी दुनियां में, खुशियों के दीप जलाए थे।

उस एक पल में कितने सपने, भविष्य के संजो लिया।
अपने योग्य समझती  हो ,प्रणय निवेदन तुमसे  किया।

स्नेह लता पाण्डेय "स्नेह"
नई दिल्ली