नही   पड़ती   है   गुलाबी  रेखाओं  की   जरूरत,
एक माँ को अपनी औलाद के एहसास के लिए।
हृदय    स्पंदन   से  महसूस   कर   लेती    है,
जिगर के टुकड़े को ममतामयी दस्तक लिए। 

देती  है  जब  हृदय  में कवित्व शक्ति दस्तक,
शब्द  खुद ब खुद  प्रस्फुटित  होने लगते है।
बाहरी आहट से हटाकर ध्यान फिर कवि,
आत्मा  की दस्तक में खोने लगते है।

देखकर श्याममेघों को मयूर,झींगुर,
दादुर    प्रफुल्लित     होने   लगे।
आसमाँ     में     छाए   बादल,
बारिश की दस्तक देने लगे।

दिल  के   कोने  में  आज  फिर,
इक  शांत   सी   दस्तक  हुई।
सी ले अपनी जीस्त को तू,
कर्म की लेकर सुई।।

शीला द्विवेदी "अक्षरा"
उत्तर प्रदेश "उरई"