बंधी हूं वचनों के बन्धनों में
चाहकर भी तोड़ नहीं सकती
संकल्प लिया है साथ निभाने का
चाहकर भी मुंह मोड़ नहीं सकती
इस कदर तिरस्कृत किया गया
तेरे महलों में मेरे आत्मसम्मान को
चूर चूर किया मेरे अभिमान को
बार बार बताया जाता है मुझे
तेरी नज़रों में मेरी क्या अहमियत है
छोड़ कर चली जाऊं जब चाहें
तुझे मेरी क्या जरूरत है
आजमा ले जितना चाहे मुझे
फिर भी तुझसे मोहब्बत है
सीख लिया हमने जीना
तेरी नफरत का घूंट पीना
जितनी नफरत है
तेरे दिल में मेरे लिए
उतनी मोहब्बत है
हर सांस में तेरे लिए
फेंका जाता है अक्सर
कीचड़ मेरे आंचल पर
धोकर आंसुओ से अपने
दामन को ओड़ती हूं
नकली हंसी उस पर
जो संकल्प लिया है मैने
उसे ना कभी तोड़ूंगी
बिखर जाऊंगी टूटकर
साथ तेरा ना छोडूंगी।।
नेहा धामा " विजेता " बागपत , उत्तर प्रदेश

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