रे मानव तुझे अहंकार क्यों?
क्या तेरे तन पर ही सदा लेप लगे....
मैं मिट्टी में जनम लिया,
लेकिन ना मुझमें अहंकार भरे....
रे मानव तुझे........

क्या खूब सजाया है तन को?
लेकिन मन में घृणा की वास....
मैं घास-भूषा सी मानी जाऊँ,
फिर भी ना किसी से कोई आस....
रे मानव तुझे........

तू जीता है एक समुंदर,
मुझे तो कुछ दिनों की आस....
कभी मर जाऊँ बीच सड़क पर,
लेकिन तू तो है सबका साथ....
रे मानव तुझे........

सीख ले अब भी बोल-बचन तू,
ना तू कभी किसी को दर्द दे....
मैं तरप रहा हूँ अब मत तरपा,
जिससे तेरे ऊपर कभी जग हँसे....
रे मानव तुझे........


      ✍️ विकास कुमार लाभ
                मधुबनी(बिहार)