मोहिनी और संयोगिता बचपन की दहलीज को पार करके जवानी में कदम रख चुकी थी। लेकिन उनका अल्हड़पन नहीं गया था अभी भी वो लोग कच्ची कैरियां चुनकर चूनर में रख लेती । और बाद में चटखारे ले ले कर खाती थी। दादी सा की उम्र बढ़ रही थी। अब वो पहले की तरह कट्टर नहीं थी। पहले की तरह पाबंदियां भी नहीं लगाती थी। क्योंकि अब वो चाहकर भी सबके पीछे भाग नहीं पाती थी उनका समय अब पलंग पर बैठे बैठे हुक्म चलाने और पान खाने में बीतता था। रोब तो आज भी वैसा ही था लेकिन शक्ति क्षीण हो चुकी थी इसलिए वह अपने यातनाओं का क्रियान्वयन अधिक नहीं कर पाती थी। हां.. उनकी वाणी की धार और तेज हो गई थी। अगर संयोगिता थोड़ी देर के लिए बाहर बगीचे में निकल जाती तो वह पोपली आवाज में चिल्ला चिल्लाकर मोहिनी और संयोगिता को ढेर सारी गालियां सुनाती । अगर वो डरती थी तो केवल मानवेंद्र से । क्योंकि वो बड़ा होकर बहुत बदल गया था।वो बचपन से ही दादी सा का अन्याय देखता चला आ रहा था । जिसने उसके कोमल मन पर बहुत गहरा असर डाला था । बाहर से वो बहुत ही अनुशासित रहता लेकिन उसके हृदय में सबके लिए दया का एक स्रोत खुला हुआ था। वह किसी को भी परेशान या दुखी नहीं देख सकता था। यथासंभव वो हर ग्रामवासी की मदद करता रहता। गांव वाले भी दादी सा के अत्याचारों से ऊब चुके थे वो अब मानवेंद्र को अपने भक्षक नहीं अपने रक्षक के रूप में देख कर बहुत खुश थे। मानवेंद्र हर ग्रामवासी के सुख दुख में शामिल होता । वो समझ गया था कि रजवाड़े अब चले गए। अगर हम अभी भी नहीं बदले तो एक दिन यही गांव वाले हमें यहां से उठाकर बाहर फेंक देंगे। क्योंकि गरीब किसानों की आह अच्छे अच्छों को भी पतन के मार्ग पर ले आती है । उन्हें तबाह कर देती है। जागीरदारी तो अब रही नहीं , मानवेंद्र ने जमीन को किसानों में बांट दिया था । जब सुबह सुबह किसान हवेली की बेगार करने की बजाय हल बैल लेकर मस्ती से झूमते हुए , लोकगीत गुनगुनाते हुए अपने खेतों की ओर जाते तो उसे बहुत खुशी होती थी। भले ही अब उसकी हवेली में कोई भी नौकर नहीं था लेकिन उसका सारा काम पहले की तरह पलक झपकते ही हो जाया करता था। क्योंकि अब भी गांव के लोग बारी बारी से सुबह सुबह हवेली आ जाते थे। लेकिन बेगार करने नहीं सहयोग करने। मिल जुलकर सब लोग काम करते और दादी सा की बड़बड़ाहट सुनते रहते। अब उन्हें दादी सा से डर नहीं लगता था। उन पर तरस आती थी उन्हें। गांव की स्त्रियां दादी सा के पास आती उनका चरण स्पर्श करती। लेकिन दादी सा किसी को आशीर्वाद नहीं देती , उल्टे वो भुनभुनाना शुरू कर देती। कभी इसकी बुराई कभी उसकी बुराई । लेकिन अब कोई भी उनकी किसी भी बात का बुरा नहीं मानता था। क्योंकि सबको पता था कि दादी सा अब एक पक्का फल है जो कभी भी किसी समय गिर सकता है। उन्हें मानवेंद्र सिंह राजपूत के रूप में एक सच्चा राजपूत मिल गया था।
मानवेंद्र के खेतों का कोई भी काम हो सबसे पहले हो जाता । होता तो पहले भी था लेकिन डर के कारण और भूखे पेट। अब मिलजुल कर मस्ती में गीत गाते हुए , चना चबैना करते हुए , घने बरगद के नीचे दोपहर में कुछ देर सुस्ताते हुए सारे खेती के कठिन काम हंसते हंसते हो जाते थे । और सांझ ढलते ही हवेली के बाहर बने एक बड़े से बरामदे में कीर्तन मंडली बैठती तो रात ग्यारह बजे से पहले खत्म होने का नाम ही नहीं लेती। एक से बढ़कर एक लोकगीत, आल्हा, कवित्त, भजन, फगुआ के मधुर गीत,कजरी, हो या सावन सबमें गांव वासी बढ़ चढ़ के हिस्सा लेते। सब कुछ अच्छा लगने लगा था ऐसा लग रहा था मानो समय रूपी घड़ी की सुई यहीं पर रुक गई है।
लेकिन शायद समय को भी करवट लेना था ,एक दिन मोहिनी और संयोगिता बगीचे में बने एक गोल चबूतरे पर बैठी हुई बातें कर रही थी एक कोने में उनके अमरूद और शहतूत रखे हुए थे ।जिनको बीच बीच में वो दोनों खाती हुई मुंह से मुंह जोड़े किसी विशेष बात को लेकर धीमे धीमे फुसफुसा रही थी ।और मोहिनी के चेहरे पर एक शर्मीली सी मुस्कान आ जाती। वो लोग दुनिया जहान से अनजान आपस में बात कर रही थी , तभी एक अजनबी सा नवयुवक उनके पास आकर खड़ा हो गया। वो दोनों उसको देखकर चौंक गईं।और अपनी अपनी चूनर संभालते हुए उठ खड़ी हुई।
कौन हैं आप? और आप इस बगीचे में क्या कर रहे हैं ? आपको शायद पता नहीं बिना इजाजत हवेली में कदम रखने वाले को दादी सा सजा देती हैं। बताइए जल्दी आप कौन हैं? वरना अच्छा नहीं होगा।संयोगिता ने हिम्मत बांधकर उस अजनबी से कहा।
उस नवयुवक ने कोई उत्तर नहीं दिया वो बस मंद मंद मुस्कुराता रहा। अब संयोगिता और मोहिनी को डर लगने लगा। वैसे संयोगिता बहुत बहादुर लड़की थी लेकिन इस परिस्थिति में एक लड़की को कितना डर लगता है वो केवल एक लड़की ही समझ सकती है। संयोगिता ने आव देखा ना ताव , अपने पास रखा हुआ एक कच्चा अमरूद उसके सिर को निशाना बनाकर फेंका।वो अमरूद सीधे उस युवक के सिर पर लगा ।और वो सिर पकड़ बैठ गया। उसके सिर पर एक गूमड़ सा निकल आया। संयोगिता ने आगे कुछ नहीं देखा सीधे मोहिनी का हाथ पकड़ा और हवेली के अंदर की ओर भागी।वो नवयुवक सुनो.. सुनो की आवाज लगाता रह गया।
संयोगिता और मोहिनी इतनी तेज भागी मानो उनके पीछे पुलिस पड़ी हो भागते भागते सीधे हवेली के आंगन में पहुंची और खड़ी होकर हांफने लगी। माला दीदी ने उन्हें इस हालत में देखा तो घबरा गई और उनके पास आई
क्या हुआ आपको? आप ऐसे क्यों भागकर आईं? मोहिनी तुम बताओ क्या हुआ इनको? और तुम भी घबराई हुई हो । ऐसा क्या हो गया? अभी अभी तो तुम इन्हें लेकर बगीचे की ओर गई थी । कोई अनहोनी तो नही हुई ? बताओ ना मोहिनी , मेरा दिल बैठा जा रहा है। माला दीदी ने सवालों की झड़ी लगा दी। आखिरकार संयोगिता में उनकी जान बसती थी। बिन मां की बच्ची को उन्होंने ही तो पाला था।
मोहिनी ने माला दीदी को सारी कहानी बता दी। तभी पीछे से उसी नवयुवक की आवाज सुनाई दी....
मैं तो आपके पीछे पीछे हवेली तक आ गया , अब बताइए क्या करेंगी?....
क्रमशः
लेखिका -
संगीता शर्मा" प्रिया"

0 टिप्पणियाँ