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दिन के उजाले में जो ,नेकी पर चलने की बात किया करते हैं।
रात के अंधेरे में उनमें से कुछ, चोरी और चीरहरण भी किया करते हैं ।।
कितनी विडम्बना है कि वो दहेज रोकने की बात करते हैं।
उनमें से कुछ ,अपनी बहु की दहेज में बलि भी करते हैं।।
नारी मुक्ति, महिला आरक्षण, महिला सशक्तिकरण का देते हैं वो नारा।
उनमें से कुछ ने तो, नारी का कर दिया है बर्बाद जीवन सारा ।।
करके बदनाम और बेघर औरत को, करते है उसका गुणगान फिर।
लूटकर आबरू औरत की , देते हैं उसको अबला नाम फिर।।
बहुत खुश हैं इस तरहां वो लोग, इज्जत औरत से पाकर ।
भरी महफिल और बाजार में , किसी औरत को नचाकर।।
धिक्कार है उन लोगों को , जिन्होंने अहसान औरत का भूलाया है ।
लेकर जन्म किसी की कोख से, दूध उन्होंने उस औरत का लजाया है ।।
वो क्या औरत को आजादी दिलायेंगे, मदहोश है वो दौलत में ।
भूल गए हैं वो ईमान, इंसानियत ,इंसाफ़ और खुद को शौहरत में।।
मर जाना उनका अच्छा है, जो देख रहे हैं आंखों से ।
औरत की इज़्ज़त , औरत का खूं ,सरेआम अय्याशों से।।
रचनाकार एवं लेखक-
गुरुदीन वर्मा उर्फ जी. आज़ाद
जिला- बारां(राजस्थान)

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