तेरी बातों को दिल से लगाता नहीं।
तेरे गलियों में अब मैं जाता नहीं।
क्या करूं गर है, मोहब्बत तो है।
हमारी चाहत तुम्हें अब बताता नहीं।
हर बात तुम्हें अब मैं समझाता नहीं।
बीती बातों को भी मैं भूलाता नहीं।
तुम्हारी तसव्वुर तो मेरे सीने में बसा है।
तुम से नजरें अब मैं मिलाता नहीं।
ग़म को सीने से अब मैं लगाता नहीं।
प्यार अपनी किसी को जताता नहींं।
हो भी जाऊं मैं गुम तुम्हारे ख्यालों में तो।
चेहरे पर सिकन अब मैं लाता नहीं।
तुम्हें हमारी याद अब आती नहीं।
मगर तेरी यादें तो दिल से जाती नहीं।
करते हो वफा तुम अपनी वफाओं से।
राह बदलने की फितरत तुम बदल पाते नहीं।।
माना, अपने वचनों को तुम निभा पाते नहीं।
अपनी फितरत भी तुम बदल पाते नहीं।
और, चाहत तुम्हारी बदलता है पल-पल।
आरज़ू है क्या? तुम खुद भी समझ पाते नहीं।।"
अम्बिका झा ✍️

0 टिप्पणियाँ