दायरा कहता है कोई,
सीमा रेखा मानता।
एक है अल्फाज़ पर,
उत्तर अनेकों खोजता।
पार की दहलीज तो,
पत्थर अहिल्या बन गयी।
कौन सा है ग्रन्थ कहता,
दहलीज पुरुषों की नही।
दहलीज थी लक्ष्मण बनाई,
पार सीता कर गयी।
परिणाम तो देखो जरा,
रावण के हाथों हर गयी।
सोच बदलों और जागो,
दहलीज सबकी है बनी।
पुरूष हो महिला हो या,
निर्धन हो या फिर हो धनी।
दहलीज की रेखाओं को,
जब पुरुषों ने भी पार किया।
रावण,दुःशासन दक्ष हो या,
सबको यथोचित फल दिया।
पार कर दहलीज को ही,
सावित्री ने पति को पाया है,
पार का दहलीज मीरा,
कृष्ण नाम का हीरा पाया है।
लांघ कर दहलीज को ही,
स्त्री ने अपना अस्तित्व पाया है।
लवलीना, मीराबाई चानू ने,
वतन का मान बढ़ाया है।
शीला द्विवेदी "अक्षरा"
उत्तर प्रदेश "उरई"

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