नज़रें बेहतरीन बयां करती हैं हरफ-ए-मुहब्बत, वरना जुबां में ये हुनर कहां।
ये तो जुल्फें जताती हैं राज़-ए-उल्फ़त, बाखुदा इशारे अभी भी इस नज़ाकत से मेहरूम हैं।
लहरा कर चेहरे से लिपट गया दुपट्टा इस कदर, मानो साज ए हस्ती गुनगुनाती हो हवा उस पर।
उंगलियां खुद-ब-खुद जुल्फों से तार्रुफ कर बैठी, मगर हम में वो ज़ज़्बा नहीं।
यूं तो दफ्न कर के रखते हैं अफसाना हाल ए दिल का,
पर आज मेरी शख्शियत इसे अलग अंदाज़ में जता रही है।
इस्तकबाल करते हैं चांद के उस फन का, जो जज्बात ए दिल का इज़हार इस खूबसूरती से ज़ाहिर करता है।

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