शनैः शनैः बढ़ता ही जाता अंधियारों का घेरा!!
मानवता भी रफ्ता रफ्ता जाने लगी रसातल,
इस धरती पर नज़र आ रहा कंकालों का डेरा!
कितने दीप जलाऊँ प्रियवर घटता नहीं अंधेरा!!
तूँ-तूँ मैं-मैं के अहंकार में उमर गुजारी सारी,
अंतकाल पछताये क्या हो जो तेरा है ना मेरा!
कितने दीप जलाऊँ प्रियवर घटता नहीं अंधेरा!!
आस्तीन में जिसको पाला उसने ही डस डाला,
यूँ बस्ती बस्ती हुआ सिकंदर बनकर एक लुटेरा!
कितने दीप जलाऊँ प्रियवर घटता नहीं अंधेरा!!
रात बसर तुमने तो कर ली, ऊँचे- ऊँचे महलों में,
मैं करवट बदल-बदल कर सोचूँ कब होवेगा सवेरा!
कितने दीप जलाऊँ प्रियवर घटता नहीं अंधेरा!!
डॉ0 अजीत खरे

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