बधाई हो मम्मी ....
ये कहती हुई ताली बजाती किन्नरों की टोली मुख्य द्वार से होती हुई ,घर के आँगन में आ खड़ी हुई , सब लोग अपने - अपने कमरों से निकल आँगन में आ गये । जहाँ वे सब खड़ी थी । आइये - आइये करती हुई मम्मी जी भी आ गई 
और बता विमलेश कैसी है । मम्मी जी ने एक खूबसूरत दिखने वाली किन्नर से पूछा ।
उसने पैर छूते हुए कहा आपका आशिर्वाद है बस दिन काट रहे है जिंदगी के ।
ऐसे नही कहते बच्चे । जीवन  अनमोल हैं । इसे हँस - खेलकर  जीना चाहिये ।
अरे माँ हम जैसे किन्नरों का जीवन रोने के लिए ही होता है । ना की हँसने के लीये ।
फिर हँस कर बोली ।अरी माँ तू भी क्या बात लेकर बैठ गई 
इतनी ख़ुशी के मौके पर ।
चल दुल्हन को तो बुला ।उसकी ब्लाइया ले लूँ । नजर उतार दूँ । देखू तो सही कैसी बहू पसन्द की हैं । हमारी अम्मा ने ।
आवाज देकर मुझे बाहर आने को कहाँ गया ।
मैं थोड़ा  शर्माती सी बाहर आई । मैने गहरे हरे रंग की साड़ी पहन रखी थी ।अपनी बड़ाई अपने मुँह नही करुँगी ।
पर सच में । मै उस हरे रंग की साड़ी में बहुत ज्यादा खूबसूरत लग रही थी ।अब नई - नई शादी में दुल्हन का  रूप तो बहुत निखरता  ही हैं । ऊपर से साड़ी इतनी सुंदर थी । खैर 
अरे मम्मी बहू तो तूने  छाँटकर ली हैं । चाँद में भी दाग होता है । पर बहू में ऊँगली रखने की भी कमी नही हैं । 
आजा बेटा तेरी नजर उतार दूँ । हाथों से ब्लाइया लेते हुए, किसी की नजर ना लगे तुझें । दुधु नहाओ पूतों फलों ।का आशिर्वाद दिया ।
मम्मी जी ने पैर छूने का इशारा किया ।
मैने एक - एक कर सबके पैर छूकर आशिर्वाद लिया ।
फिर उन लोगों ने रोली ,चावल, कुछ पैसे रुमाल में रखकर पूजा की और मेरी गोद भराई की ।ताकि जल्दी से घर में किलकारियां  गुंजे । 
फिर मैं सब लोगों के लिए चाय बनाकर ले आई ।
चाय पीने के बाद नाचना - गाना हुआ  ।
खूब मस्ती हुई ।
छेड़खानी भी खूब हुई ।
मेरी ननदों ,जेठानी ,सासु माता जी सबके साथ ।
आस - पड़ोस की औरतें भी आ गई थी ।
खूब मजा आया ।हँस  - हँस कर बुरी हालत हो गई ।
अब समय आया नेग लेने का । अड़कर बैठ गई इक्कीस हजार रुपये से कम नही मानूँगी । देख ले मम्मी । मैं कुछ नहीं जानती ।मेरे साथ जो आई है । सबको कपड़े  भी देने हैं ।
बड़े बेटे की शादी में पन्द्रह हजार रुपये लेकर गई थी ।तीन साल बाद आई हूँ । तो इतने रूपये ज्यादा नही हैं ।
मम्मी बोली कुछ तो कम कर । ये तो कुछ ज्यादा हैं ।
कुछ भी बोल लो नही मानूँगी ।
मम्मी को ही उनकी बात माननी पड़ी । जो वो बोल रही थी ।दे दिया ।खुश होते हुए बधाईया देते हुए ढेरों आशिर्वाद देते हुए चली गई ।
वैसे तो समाज में किन्नरों को ज्यादा इज्जत नही दी जाती ।बल्कि जिसमे उनका कोई कसूर ही नही है । उसके लिए उन्हें घृणित दृष्टि से देखा जाता हैं । जन्म देने वाले ही अपनाना नही चाहते ।  तिरस्कृत  जीवन  व्यतीत करना पड़ता हैं । घर - घर जाकर लोगो को शादी या बच्चा होने की ख़ुशी में बधाई दे देकर  उनसे मिलने वाले पैसों से ही घर खर्च चलता है  ।
हमारे यहाँ किन्नरों का घर आना शुभ माना जाता हैं ।
इन्हें नाराज नही किया जाता ।
अगर रास्ते में कोई किन्नर मिल जाये तो आशिर्वाद लिया जाता हैं ।।
 नेहा धामा " विजेता " बागपत , उत्तर प्रदेश