शरद पूर्णिमा की चांदनी मे धुलकर 
तेरी यादें अमृत बन जाती है 
मै इस अमृत के रसपान करके अमर हो जाती हूँ 
षोढ़श कलाओं से युक्त शशि प्रकाश जब
शीत बिंदु संग दिव्य मिलन से सुधा रस बरसाता है
तब इस प्रेम रमणी काया मे मिलन वेग उपजाता है
अमृत, नंदा,पुष्प,कांति आदि कलाओं से जब निशा तिमिर हर जाता है
तब तुम्हारी स्मृतियों का सुधा- रस मुझे अमर बनाता है

कविता गुज्जर