वो घटा सा है पर बरसता नही बहती हवा सा है कहीं रुकता नही
वो काली रात मे जुगनु सा है
चांदनी रात मे स्पर्श मृदु सा है
वो सर्द रात मे गर्म आँहो सा है
गर्म दोपहर मे ठंडी राहों सा है
वो सावन की रिमझिम सा है
वो तारों की झिलमिल सा है
वो दरिया सा छटपटाता है
पर सागर सा शान्त भी है
वो प्यार की तडप है ओर खामोशी का सबक भी है
वो तूफान सा आता है
ओर मुझमे बिखर जाता है

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