रोते को जो हंसा दे ,
वह खुशी पिता ही तो है।
सारे दुखों को जो भुला दे,
वह हंसी पिता ही तो है।
कड़ी धूप में छाया दे,
वह वृक्ष पिता ही तो है।
हर इच्छा पूरी करें,
वह यक्ष पिता ही तो है।
कांटे चुनकर फूल बिछाए,
वह माली पिता ही तो है।
पकवानों से तृप्त करें,
वह थाली पिता ही तो है।
हर जिद में हो जाए राजी,
पिता ही तो है।
हर ताला खुल जाए वो चाबी,
 पिता ही तो है।
हर सपने को करें जो साकार,
पिता ही तो है।
सारे संकल्पों के मूर्तिकार,
पिता ही तो है।
हर संकट के तारणहार,
पिता ही तो है।
हमारे आदर्श जीवन-आधार,
पिता ही तो है।


     प्रीति मनीष दुबे
       मण्डला(म.प्र)