मैं तुम्हारा पिता हूं
तुम्हारे लिए जीता मरता हूं
मारकर अपनी ख्वाहिशों को
तुम्हारी जरूरतें पूरी करता हूं
आसमां हूं दूर होकर भी पास हूं
आस हूं तुम्हारी विश्वास भी मैं हूं
देखने में तो बड़ा धीर गंभीर हूं
पर तुम्हारे प्यार में बड़ा अधीर हूं
मत घबराना तुम कभी
राहों के घने अंधकार से
परछाई बन तुम्हारे साथ
हूं तुम्हारी एक पुकार पे
सोचता नहीं कभी खुद के बारे में
जिस्म मेरा हैं इसमें प्राण तुम्हारे हैं
जब जब आएं मुसीबत तुम पर
ढाल बन कर सामने खड़ा हूं
संकोच वश जो बाते
कह नहीं पाते तुम मुझसे
तुम्हारे चेहरे के भाव पढ़
जान समझ लेता हूं
हूं जनता हंसी के पीछे छिपे ग़म को
तू कितनी कोशिश कर छुपाने की
तेरी नस नस में मेरा रक्त दौड़ता हैं
तभी तो मैं तेरा पिता कहाता हूं
नेहा धामा " विजेता " बागपत , उत्तर प्रदेश

2 टिप्पणियाँ