करना चाहतीं हूं एक मुलाक़ात
अपने अंदर छुपी एक मासूम बच्ची से
जो चाहतीं हैं एक टुकड़ा धूप
अपने ही अंदर छुपे आंगन के कोने में।
अनजान राहों का राही मन मेरा
तुतलाती हुई भाषा में कहता
बाजारों की रौनक नहीं चाहत इसकी
अपने मन में एक दीप सदा जलता रहे वीराने में ।
छुटपुट सी एक मुस्कान आसीन अधरो पर
पड़ रहा अकाल सुकून स्नेह सम्बन्ध में
धुंधली कामना एक उजास सवेरे सा अंतर्मन
जुगनू सा चमकाता अपने विश्वास को अंधेरे में ....
© रेणु सिंह " राधे " ✍️
कोटा राजस्थान

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