तु हंस और मैं तेरी हंसनी
हमारा ये हंसों का जोड़ा।
संग रहकर भी है जुदाई,
जीवन ने हमें कैसे मोड़ा।
चंद हजार की पगार खातिर,
दिनभर तुम गायब घर से।
ये तो सही है,लाचारी है,
पर लगे निकली दिल के दर से।
मित्रों संग जब करो ठिठोली तुम,
देख मुझे होता है गम।
मन मसोस रह जाती मैं,
कभी-कभी आंखें हो जाती नम।
ना सुहाये मुझे नैनों का काजल,
चिढ़ाती मुझे होठों की लाली।
ना भाये कंगन की खनक,
झांझर की झुन लगती गाली।
मेंहदी कभी लगाऊं यदि,
लिखूं हथेली पर तेरा नाम।
पर वो दिन 'क्यों' ना आता,
जब ढ़ूंढ़ों तुम खुद का नाम।
लौटो तुम थके-हारे रोज,
फिर चाहते तुम सिर्फ आराम।
मैं दिनभर बाट देखती,
मेरा आराम लगे मुझे हराम।
-चेतना सिंह।

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