प्रेम समर्पण है तो प्रेम अधिकार भी है। प्रेमी से ही मन की बातों को कहा जाता है। प्रेमी पर ही भरोसा किया जाता है कि वह उसकी बात को महत्व देगा। रूठा भी प्रेमी से ही जाता है और मनाया भी प्रेमी को ही जाता है। संसार के सभी रिश्तों की तुलना में प्रेम का रिश्ता बहुत अलग होता है। जहाँ कभी भी किसी की हार नहीं होती। जहाँ कर्तव्य ही अधिकार होता है।
संध्या की जिंदगी पटरी पर आने लगी। पुरानी बातों को भूल वह जिंदगी की राह पर बढ ली। प्रवेश का दाखिला एक विद्यालय में कर दिया गया। जहाँ दिन में बच्चों के रहने की भी सुविधा थी। कई बार संध्या अपनी नौकरी में देर से भी घर वापस आती। पर प्रवेश को कोई दिक्कत न हो, उसने ऐसी व्यवस्था कर रखी थी।
फौज की नौकरी में और पुलिस की नौकरी में कुछ अंतर भी होता है। हालांकि संध्या कठिन से कठिन परिस्थितियों में नौकरी करने की आदी थी। पर कठिनाई केवल शारीरिक परिस्थितियों की नहीं होती है। अनेकों बार मानसिक पीड़ा ज्यादा कठिन होती है। पर संध्या सभी स्थितियों से निपटने लगी। जल्द नयी भूमिका को वह समझ गयी।
आजकल जब भी राजीव संध्या के सपनों में आता, दोनों प्रेमियों में रूठने और मनाने का खेल ही ज्यादा होता। कभी राजीव रूठने लगता। संध्या को उलाहना भी देने लगता।
" यह क्या संध्या। तुमसे ऐसी उम्मीद न थी। तुमने अपना वायदा ही तोड़ दिया। मैंने दुनिया क्या छोड़ी, तुम भी बदल गयीं।"
संध्या समझ जाती कि राजीव किसकी बात कर रहा है।
" दुनिया के रंगों को देखकर सचमुच अब मैं निर्मोही हो गयी हूं। अब बस कर्त्तव्य निभा रही हूं। रिश्तों के बंधनों से खुद को मुक्त कर चुकी हूं। एक स्त्री के लिये सबसे महत्वपूर्ण रिश्ता उसकी संतान से होता है। सत्य है राजीव। प्रवेश के लिये भी मैं अपना कर्तव्य निभा रही हूं। मोह के बंधनों से खुद को मुक्त कर रखा है। "
" तो क्या अब तुम्हारे मन में मेरे लिये कोई रिश्ता नहीं बचा। क्या प्रेम का रिश्ता भी मिट चुका है।"
संध्या चुप रह जाती। उसकी चुप्पी व्यक्त कर रही थी कि संध्या किसी भी तरह प्रेम के बंधन को छोड़ नहीं पायी है। आज भी वह राजीव की ही आराधना करती है। पर यह आराधना जरा बराबरी की है। वास्तव में दोनों ही एक दूसरे के भगवान हैं।
यों ही कभी राजीव रूठ जाता। फिर संध्या उसे मनाती। कभी संध्या भी राजीव से रूठ जाती।
" आपको क्या पता। खुद तो इस निर्मोही दुनिया को छोड़ गये। अच्छा रहता कि मुझे भी साथ ले जाते। राजीव। यह झूठ नहीं है कि दुनिया उससे भी ज्यादा निष्ठुर है, जितना हम उसे समझते हैं। अब मत आया करो मेरे पास। खुश रहो, देवों की उस दुनिया में। छोड़ दो मुझे अकेला। मैं खुद सोचूंगी कि मुझे क्या करना है।भले ही प्रेम किया है। पर खुद के निर्णय खुद ही लूंगी। आखिर एक पुरुष को क्या अधिकार, वह किसी स्त्री के चाहे वह उसकी पत्नी ही क्यों न हो, के निर्णयों में हस्तक्षेप करे। क्या स्त्री खुद निर्णय करने में सक्षम नहीं है। निश्चित ही सक्षम है। "
संध्या के उलाहना देने पर भी राजीव बार बार उसके सपनों में आता। कह सकते हैं कि यह सब संध्या के मन का अंतर्द्वंद्व ही था। जो बार बार सोचा जाता है, वही सपनों में नजर आता है। कह सकते हैं कि राजीव के माता पिता से भी संपर्क त्याग देने के खुद के निर्णय की विवेचना संध्या कर रही थी। कह सकते हैं कि वह लगातार राजीव को याद करती थी, इसीलिये उसे अपने सपनों में देखा करती थी।
संभावना यह भी है कि दोनों प्रेमियों का मिलन अभी भी होता हो। भला दो प्रेमी कब अलग होते हैं।
आखिर संध्या हार गयी। वह किसी स्त्री की हार न थी। यह हार उसके प्रेम में समर्पण थी। प्रेम में हार या जीत कुछ नहीं होता है। प्रेम में मिली हार भी वास्तव में एक विजय ही होती है।
सभी रिश्तों से तटस्थ रहने का निश्चय कर चुकी संध्या तटस्थ न रह पायी। आखिर एक दिन अपने ससुर और सास के लिये पत्र लिखने बैठ गयी। इस बार जब वह पत्र लिख रही थी, उसकी आंखों से आंसुओं की अविचल धारा बहती रही। भावनाओं के प्रवाह में वह लिखती गयी। इतना बड़ा पत्र उसने कभी नहीं लिखा था। यदि कोई इंसान उस पत्र को पढेगा तो निश्चित ही उसकी आंखें नम हो जायेंगी। ईश्वर द्वारा सृजित दो पैरों से चलने बाली, अपनी बुद्धि से सृष्टि में सर्वश्रेष्ठ मानी जाती मनुष्य नाम की रचना को ही इंसान नहीं कहा जा सकता है। अनेकों इंसानियत को भुला देने बाले भी इस संसार में मौजूद हैं। उन्हें इंसान कहना भी शायद उपयुक्त न हो। इस तरह इंसान के वेष में मौजूद पशुओं का मन भावना शून्य होता है।
संध्या का वह खत ठाकुर साहब को मिलकर भी नहीं मिला। संध्या द्वारा लिखा यह पहला पत्र था जो गुम हो गया। वास्तव में संध्या का वह खत गुम नहीं हुआ था, अपितु किसी को मिल गया था। संध्या का वह खत तैयार कर रहा था उस पृष्ठभूमि को जबकि संध्या को प्रत्यक्ष रूप से उसके ससुर और सास का आशीर्वाद मिलने लगे। गुम होकर भी वह खत उस भूमिका का निर्माण कर रहा था जबकि इंसानियत की तराजू पर ऊंच और नीच का कोई मोल न हो। तैयार हो रही थी वह मनोदशा जबकि ठाकुर होने के अहम को छोड़ ठाकुर नरेश संसार के सामने भी संध्या को अपनी पुत्रवधू स्वीकार करेंगें।
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'

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