फैला हुआ प्रदूषण है...
जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण
भुमि प्रदूषण.. के मध्य में
मानवजन है पूर्ण दोषी..
संलिप्त निज स्वार्थ में..
कर रहा है भू क्षरण..
मृदा दोहन.. वृक्षों का..
करता विनाश..
पावन नदी में फेंकता..
निर्माल्य अपना..
कर देता पतन.. पावन नीर का.
उभरते हुए "जलज" हैं पंक से..
पंक से रहता नहीं संसर्ग कोई..
सीख ले मानव अगर पंकज से इतना..
कर सके प्रतिकार गर दुर्नीति का..
पुष्प संग कांटों को रहना है हमेशा..
हो उभरता भाव मन में प्रीत का..
हो रहा निस्तेज जन का आचरण..
है दूषित उर में..
धधकती ज्वाला..
जो प्रतिशोध की..
इर्ष्या, द्वेष, असहिष्णुता..
सम फैला अवयव जहाँ..
कर रहे परिकल्पना..
कर दे पराजित अवगुणों को..
हो प्रदूषण मुक्त अपनी ये धरा..
प्रकृति भी..
शुद्धतावादी बने..
मानव अगर..
दूर हो उर का प्रदूषण.. !
उर्मिला तिवारी
देवरिया
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