हाँ - सजने संवरने का बहुत शौक था लीना को। यौवन की दहलीज पर आकर उसका शौक तीव्र सा हो गया था। श्रृंगार करके विमुग्धा सी स्वयं को दर्पण में निहारना और कल्पना लोक में विचरण करने। प्रेमी दर्पण उसकी प्रशंसा कर रहा है- "लीना दुनियाँ की सुंदरतम रूपसि तुम ही हो।"
मलय भी तो उसके रूप पर रीझ गया था। उसने जब बेला, चमेली, पारिजात, जूही, गुलाब ढेर सारे फूलों के गजरे से अपने केश सजाए थे। अपने रूप का अनुपम श्रृंगार किया था। 
अधीर प्रेमी बोल उठा-लीना तुम्हारे रूप और यौवन की मादक सुगंध से मैं मूर्छित हुआ जाता हूँ अपनी प्रेम का दान दे दो प्रिये और वह उसकी नशीली बातों के नशे में बहकती चली गई थी जब उसे होश आया , वह अपना माथा पीटकर रह गई थी। मलय उसके यौवन का रसपान करके जा चुका था। 
उसने बहुत समय मलय की प्रतीक्षा की किन्तु आज उसे ज्ञात  किसी से  हुआ कि वह अपनी सुगंध को किसी और कलिका पर बिखेर रहा है। लीना ने अपनी निस्सीम पीड़ा को अपने अंतर्मन में विगलित कर लिया और नयनों को इस प्रकार मूंद लिया मानो उसका रूप ही उसका सबसे बड़ा शत्रु है ,वह इसका अवलोकन करने की इच्छुक नहीं है।

"रूप पर न जाओ मेरे,दिल वीरान लिए बैठे हैं।
तन्हा है सफर अब भी किसी का निशान लिए बैठे हैं।
बिखरी  है  इन वादियों में तेरी यादों की खुशबू।
 ग़ज़रो के भीतर अपनी बरबादी का सामान लिए बैठे हैं।"

स्नेहलता पाण्डेय 'स्नेह'