स्त्री घर की दहलीज के पार ,
मर्यादाओं का लेती भार ..!!
समाजिक मूल्यांकनों की उंगलियों का ,
होती रहती हर क्षण शिकार ...!!
कुछ द्रोपदी में ,कुछ गिनती में सीता होती ,
तुच्छ मानसिकता की धार ..!!
उसने धारण किया झीना आवरण,
समाज के ठेकेदारों ने किया विभत्स हाहाकार ..!!
जन्म लिया है , किया उपकार,
स्त्री मर्यादाओं की नहीं पुकार ..!!
(स्वरचित कविता)
सुनंदा ☺️

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