यह दुनिया वह अजीब ओ गरीब मेला है ,
जहां हर शख्स तन्हा ,अकेला है  !
कोई नहीं है अपना फकत ,
मतलब से सबने घेरा है  !
खेल रहे हैं सब दिलों से खिलौनों की तरह,
कोई दिल से नहीं किसी का है !
बिक रहा है हर शख्स मिट्टी के खिलौनों के मोल ,
इंसान का कोई भाव ही ना रह गया है !
वक्त झूलाता है झूला अपने इशारों पर,
 है वक्त जिसके साथ पेंग उसी ने बढ़ाया है !
 जिंदगी भी पकाती है कई बार व्यंजनों की तरह,
 इसका हर ज़ायका सबको चखना ही है !
 यह जिंदगी वह मेला है ,
 जो सिर्फ एक बार ही लगता है!
 जी लो इसके हर करम और सितम ,
 यह मौका दोबारा ना मिलने वाला है !