दुनिया के मेले में आज सकून हर इंसान का कुछ खोया-सा
दर-ब-दर भटक रही ज़िन्दगी उलझनों में घिरा बैठा खामोश-सा

 ज़िन्दगी की हकीकत में खो जाती है जाने कब ख़्वाइशें
हालातों से समझौता करता रह जाता इंसान रोया-सा

सुकून की तलाश में जाने कब खो बैठता है इंसान खुद को
भीड़ में भी तन्हाई चुभती है दामन रहता है आँसुओं से भीगोया-सा

ये जीतने की चाह भी जानलेवा हो जाती है उम्र के हर पड़ाव के साथ
सब कुछ हार कर भी बिखरता नहीं जीत का नशा धुएँ-सा 
 स्वरचित एवं मौलिक
 सुनीता कुमारी अहरी