चारों तरफ़ एक रेला है
                 दुनियां का रंगीन मेला है 
आईना दिखा देता है आज को
        कल तो फिर भी अनजान अकेला है

सुख के सागर में हाथ पकड़ साथ 
                   दुःख में तो हमेशा रहे वीरान है
तस्वीरों में  कैद कुछ अनमोल पल
          हक़ीक़त में वहीं तन्हाइयो का झमेला है।

इंसान को इंसान न समझे
       बड़े पर्दे का खेल निराला है 
कहीं नज़र फेर गुस्ताख़ी
       कहीं आंखो में बेशर्मी का प्याला है।

धड़कन उसकी हर जू सुनाई दे
                कमबख्त इश्क का रोग पुराना है 
रहने लगें  दुनियां की भीड़ में अकेला
      " राधे " वहीं तो ख़ुद से जीत पाया है ।

ख़ुद ही ख़ुद में, मिलने आती हूं कई बार 
         आने जाने का रास्ता  मन का तयखाना बनाया है
समझदारी की बातें छोड़ कभी कभी 
     दिल मेरा नादानी करने पर चला आया है


© रेणु सिंह " राधे " ✍️
कोटा राजस्थान