सूरज देता एक तपन
 और चांद एक सी  शीतलता
 नदियां देती सबको पानी
 सुमन समान महकता
 फिर भी
स्कूली बच्चों के साथमैं क्यूं नही
बसता बोतल टिफिन किताबें 
मेरे क्यों नहीं 
पढूं लिखूं कुछ बनूँ ये सपना
  मेरा क्यों नहीं
 कोई मुझे शाला पहुंचाए
 अपना क्यों नहीं 
मजदूरों के घर जन्मी
 क्या यही कुसूर है मेरा
 मजबूरी बन गई आज
 एक छोटा भाई है मेरा
 मां बापू जब रोज कमाते
 दो जून की रोटी जुटाते
  घूम घूम कर करें दिहाड़ी 
हमको शाला भेज ना पाते
 कलम खिलौने दूर हो गए
 काम हमारे शुरू हो गए
 बनना था हमको भी अफसर
अब तो हम मजदूर हो गए 
हालातों के आगे देखो 
कितने हम मजबूर हो गए।


     प्रीति मनीष दुबे
       मण्डला(म.प्र)