दादा जी देखिए ना ! स्कूल में कैसे - कैसे चित्र दें देते हैं और कहते हैं इस चित्र को देखकर इस पर निबंध लिख कर लाओ । मेरी तो कुछ समझ में ही नहीं आ रहा है कि यह चित्र क्या है ?' नौवीं क्लास में पढ़ रहे हैं सार्थक ने अपने दादाजी की तरफ एक कागज बढ़ाते हुए कहा ।
' देखता हूॅं ! कैसी तस्वीर स्कूल वालों ने तुम्हें दी है जो तुम्हें समझ में ही नहीं आ रही है ।' सार्थक के दादाजी ने उसके हाथ से कागज लेते हुए कहा ।
दादाजी की कुर्सी के पास ही सार्थक बैठ गया और दोनों दादा - पोते उस तस्वीर को देखने लगे । सार्थक के दादा जी कुछ देर तक तो उस तस्वीर को बहुत ध्यान से देखते रहे उसके बाद उन्होंने कुर्सी पर अपने सिर को टिका दिया और अपनी ऑंखें बंद कर ली । सार्थक अपने दादा जी को ध्यान से देख रहा था और वह खुद महसूस कर रहा था कि दादाजी कुछ सोच रहे हैं तभी उन्होंने अपनी ऑंखें बंद कर रखी है ।
लगभग दस मिनट बाद सार्थक के दादाजी ने अपनी ऑंखें खोली और सार्थक से कहा :- " तुम्हारे स्कूल वालों ने हमारे देश की ही नहीं बल्कि पूरे विश्व की समस्या पर तुम्हें निबंध लिखकर लाने के लिए कहा है ।
' मैं कुछ समझा नहीं दादा जी ? आप क्या कह रहे हैं मेरी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा है । ऐसी कौन सी समस्या है जो हमारे देश की ही नहीं बल्कि संपूर्ण विश्व की है ।'
सार्थक ने दादाजी की तरफ देखते हुए उनसे पूछा ।
' जनसंख्या की समस्या और यह जनसंख्या ही सबकी समस्या है । जानते हो ! अपने देश भारत में शिक्षा और अंधविश्वास के कारण यहां के लोग प्रतिवर्ष अपनी जनसंख्या में एक ऑस्ट्रेलिया की जनसंख्या जोड़ देते हैं ।
अभी भी हमारे देश में बाल विवाह हो रहे हैं हालांकि सरकार ने बाल विवाह के खिलाफ कानून भी बनाए हैं लेकिन फिर भी हमारे देश में यह होता है । रोक लगी है पर पूरी तरह से इस पर नियंत्रण नहीं पाया जा सका है और ऊपर से अशिक्षा के कारण परिवार नियोजन में कमी ने हमारे देश की जनसंख्या को और भी बढ़ा दिया है और तो और हमारे देश के अधिकांश लोगों की सोच भी हमारी जनसंख्या पर भारी पड़ रही है । बेटे से ही घर - परिवार और उनका खानदान आगे बढ़ता और चलता है इस अंधविश्वासी सोच ने जनसंख्या को बढ़ाने में अपनी अहम भूमिका निभाई है । बेटे की चाह में ५-६ बेटियां पैदा होती जा रही है जिसकारण जनसंख्या बढ़ती ही जा रही है और यही वजह है कि हमारे देश में विश्व की आबादी का छठवां भाग रहता है । इस जनसंख्या के कारण हमारी स्थिति कष्टदायक होती जा रही है । लोगों की भीड़ और उससे बढ़ता प्रदूषण मानव जाति के लिए खतरा पैदा कर रहा है लेकिन फिर भी लोग संभल नहीं रहे हैं । लोग ज्यादा होते जा रहे हैं और भूमि की कमी होती जा रही है । खाने रहने वाले ज्यादा होते जा रहे हैं और खिलाने वाले कम होते जा रहे हैं । साथ ही बेरोजगारी भी बढ़ती जा रही है । मैं तुम्हें एक उदाहरण बताता हूॅं । अभी कुछ दिन पहले तुम्हारी दीदी एनडीए का एग्जाम देने गई थी चूंकि मैं उसे छोड़ने गया था इसलिए मैंने वहाॅं पर देखा कि वह इतना बड़ा स्कूल पूरे लड़कियों से ही भरा पड़ा था । मेरी पोती ने बताया था कि इस एग्जाम के लिए दो लाख लड़कियों ने अप्लाई किया हुआ है लेकिन सिर्फ बीस लड़कियों को इसमें पास किया जाएगा । तुम समझ सकते हो कि बेरोजगारी कितनी बढ़ गई हैं । सिर्फ बीस नौकरी के लिए दो लाख लड़कियों ने फॉर्म भरे हैं । जनसंख्या तो बढ़ रही है लेकिन पर्याप्त साधन नहीं बढ़ रहे हैं । लोगों की जनसंख्या तो दिन - प्रतिदिन बढ़ रही है लेकिन उसके लिए पर्याप्त रोजगार उपलब्ध नहीं है ।' सार्थक के दादाजी और कुछ बोलते उससे पहले ही सार्थक के मन में एक सवाल उठा और उसने तपाक से दादा जी से पूछा कि " यह जनसंख्या कम कैसे होगा दादाजी ?"
सार्थक के दादाजी ने उसकी तरफ मुस्कुरा कर देखते हुए कहा :- " सबसे पहले तो हमें अशिक्षा और अंधविश्वास जो की जनसंख्या वृद्धि के मूल कारण है उसे जड़ से समाप्त करना होगा और इसके लिए हमें किसी और पर दोषारोपण करने की बजाय स्वयं ही इस ओर कदम बढ़ाने होंगे । दूसरों द्वारा की गई भूल से सीखकर हमें उससे शिक्षा लेनी होगी और उस पर अमल करना होगा । हम सबको वों गलती नहीं दोहरानी होगी जो हमसे पहले और लोगों ने की है । हम सबको अपनी सोच बदलनी होगी और उस सोच को अपनी अगली पीढ़ी को भी देना होगा । प्रत्येक को यह सोच रखनी होगी कि चाहे लड़का हो या लड़की हमें दो बच्चों से अधिक बच्चे नहीं करने हैं ।
हमें अपनी सदियों से चली आ रही पुरानी सोच को बदलना होगा । आज तक हमारी यह सोचते कि जिस माता - पिता को बेटा नहीं होता है उसे नरक में स्थान मिलता है इसलिए भी उन्हें अपने आपको तरवाने के लिए तारणहार बेटा चाहते हैं और उनकी सोच का ही असर होता है कि जब तक उनके घर में बेटा पैदा नहीं हो जाता तब तक वह परिवार नियोजन जैसी सुविधाओं का लाभ जानबूझकर भी नहीं उठाना चाहते हैं । जब तक हम देश और विश्व की समस्या इस जनसंख्या को अपनी समस्या नहीं मान लेते तब तक हमारा प्रयास निरर्थक रहेगा क्योंकि दूसरों के लिए प्रयास करने में हम अपना एड़ी चोटी का जोर नहीं लगा पाते हैं जबकि जब कोई भी समस्या खुद पर आती है तब हम चाहते हैं कि जैसे भी हो यह समस्या हमारी जिंदगी से चली जाएं और इसके लिए हम सब कुछ करने को तैयार रहते हैं । "
सार्थक अपने दादा जी की बातों को समझने का प्रयास कर रहा था । उसके दिमाग में दादाजी द्वारा कही बातें घूम नहीं थी । वह उनके शब्दों पर विचार कर ही रहा था तभी फिर से उसके दादाजी ने कहना शुरू किया :- " तुम सब भविष्य में इस देश की यूथ बनोगे । तुम सब ऐसा नहीं है कि अशिक्षित हो । वर्तमान स्थिति को देखते हुए तुम सब बखूबी समझ सकते हो कि भविष्य में तुम सबको और भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है अगर हम सबने मिलकर इस जनसंख्या रूपी दैत्य का संहार नहीं किया तो । अपने रूढ़ीवादी सोचो को दरकिनार कर अपने भविष्य और इस देश के भविष्य के बारे में तुम सब को ही सोचना है और जिस दिन यह सोच सही दिशा में होगी उस दिन हमारा देश विकासशील नहीं बल्कि विकसित देश कहलाएगा ।
' मैं अपनी तरफ से पूरी कोशिश करूंगा दादाजी कि मैं अपनी आने वाली पीढ़ी को आपके द्वारा बताए गए राह पर चलने के लिए प्रेरित कर सकूं ।' सार्थक ने अपने दादाजी की तरफ देखते हुए कहा ।
' मैंने तो इस राह में अपने कदम बढ़ा ही दिए हैं तभी तो तुम्हारे पापा और तुम्हारी बुआ मेरे दो ही बच्चे हैं और तुम्हारे पिता ने भी मेरे द्वारा जलाई गई मशाल को एक मैराथन की तरह आगे बढ़ाया है और इस मशाल को अब तुम्हें अपने आगे वाली पीढ़ी को बढ़ाते चलना है । यह जिम्मेवारी मैं तुम्हें देता हूॅं । मैं मानता हूॅं कि मेरे द्वारा उठाया गया कदम अभी छोटा है लेकिन अगर प्रत्येक घर से ऐसा ही छोटा कदम उठाया जाने लगा तो यहीं छोटा कदम आगे चलकर हमारे देश को और हमारे भविष्य को सुरक्षित
रखेगा ।' सार्थक की पीठ पर हाथ रखते हुए उसके दादाजी ने उससे कहा ।
सार्थक ने अपने दादाजी को मुस्कुरा कर देखा और कहा कि अब मैं आपके द्वारा बताए गए शब्दों के आधार पर अपना निबंध तैयार करूंगा और आप देखना ! इस निबंध लिखने में तो मुझे सफलता मिलेगी ही साथ ही आज आपने जो मुझे ज्ञान दिया है इसके आधार पर मुझे सफलता पाने से अब कोई नहीं रोक सकता है ।
धन्यवाद 🙏🏻🙏🏻
" गुॅंजन कमल " 💓💞💗

0 टिप्पणियाँ