जनसंख्या का दावानल
फैल रही चंहू ओर।
संसाधन सब घट रहे,
नही इसका कोई छोर।
गरीबी अशिक्षा लद रहे,
पड़ रही मंहगाई की मार।
दाने को मोहताज हो रहे,
जनसंख्या हो रही भरमार।
गरीब,और गरीब हो रहा,
धनवान,हो रहे धनवान।
आर्थिक तंगी जूझते,
मंहगाई झेल रहे आम इंसान।
परिवार विस्तृत हो रहा,
घट रहे जमीन जायदाद।
आबादी की भीषण बाढ़ में,
खाने को मोहताज।
बेरोजगारी के बोझ तले,
दब रहे सब इंसान।
जनसंख्या विस्फोट कुचल रही है,
क्या कर सकते है भगवान।
पेट्रोल डीजल आग लगा रहे,
हर चीज के बढ़ रहे दाम।
जनसंख्या विस्फोट से,
मिल रहा न कोई काम।
जल थल जंगल और गगन,
सब चीख के बोल रहे है।
बढ़ते जनसंख्या के दानव से,
समूचे पृथ्वी डोल रहे है।
एक दिन ऐसा आ सकता है,
जब जनसंख्या बोझ बढ़ जायेगा।
गरीबी,बीमारी,और बेरोजगारी से,
सब काल के गाल समा जायेगा।
कुछ ऐसा कर जाएं,
बाल विवाह बंद हो जाए।
सामाजिक कुरीतियों को दूर करें,
जनसंख्या वृद्धि थम जाए।
सामाजिक कुरितियों को रोके,
परिवार न अधिक बढ़ाएं।
जनसंख्या विस्फोट रोकने,
मिलकर अभियान चलाएं।
🌲🎄🌲स्वरचित,,,💘💘💞💞💔💔💞🔥🔥🌺🌹🏵️✍️✍️प्रितम वर्मा

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