पिता , यह शब्द सुनते ही एक मूर्ति सामने आ खड़ी होती है जो अपने बच्चों की फरमाइश पूरी करने के लिए अपने सुख का परित्याग कर कोल्हू के बैल की तरह जिंदगी भर घर गृहस्थी के पहिए के साथ लगा हुआ घूमता रहता है तबउसके कठिन परिश्रम से जीवनयापन का तेल निकलता है, जिसमें उसका परिवार अपनी जिंदगी गुजारता है, बस अपने परिवार की खुशी के लिए वो होंठो पर मुस्कान लिए अपने कर्तव्य पथ पर चलता रहता है।
लोग प्रेम की अनेक परिभाषाएं बताते हैं लेकिन मेरे लिए प्रेम की एक ही परिभाषा है माता पिता। प्रेम का आरंभ प अर्थात पिता और प्रेम का अंत म अर्थात माता से होता है , बीच में तो कई रिश्ते बनते हैं जो कि कहीं ना कहीं स्वार्थ से जुड़े होते हैं,
मेरे लिए मेरे पापा किसी भगवान से कम नहीं, मैने भगवान को तो नहीं देखा पर अगर भगवान वास्तव में हैं तो वो हमारे माता पिता के रूप में हैं। मुझे याद है जब मैं बहुत छोटी थी और हमारे घर में दीवाली थी, मोहल्ले के हर घर में दिए जलने की तैयारी हो रही थी बच्चे नए नए कपड़े पहने हुए खुशी से घूम रहे थे तब हमारे घर में अंधेरा था मैं और मेरी छोटी बहन पारुल घर के बाहर बैठकर सबके घरों में जलते हुए दिए और छूटते हुए पटाखे देख रहे थे, हर घर में मिठाईयां बनी थी लेकिन मेरे घर में चौलाई की सब्जी और रोटी बनी थी, मेरी मम्मी ताईजी से गेहूं का आटा उधार लेकर आईं थी, क्योंकि उस समय हमारे घर में राशन भी नहीं था, पापा सुबह से घर से बाहर थे, कहां थे किसी को कुछ पता नहीं था, ताऊजी के लड़के मेरे बड़े भैया राम उन्हें ढूंढने के लिए पूरे गांव में घूमे थे लेकिन उनका कही पता नहीं चल रहा था मम्मी रो रही थी, आजी पापा के ऊपर गुस्सा हो रही थी वो मम्मी से कह रही थी कि
" साल भर का त्योहार आज बिना दिया जलाए ही निकल जा रहा है और अभी तक उस नवाब का पता नहीं है, कहीं घूम रहा होगा आवारा दोस्तों के साथ, घर में सब लोग भूखे बैठे हैं इस बात की कोई चिंता नहीं उसको। आने दो घर आज उसको, अच्छे से खबर लेती हूं"
रात के आठ बज रहे थे, सारा घर अंधेरे में डूबा हुआ था, मम्मी बार बार बैठक तक जाती और फिर वापस आ जाती थी, बाहर दरवाजे तक जाने की इजाजत तो थी नहीं। तभी पापा की जर्जर साइकिल की आवाज सुनाई पड़ी, आजी और ताऊजी ने पापा को खूब डांटा। सबकी डांट खाने के बाद पापा सिर झुका कर बोले
अम्मा, भैया , आज दीवाली है और मेरे घर में खाने को एक दाना नहीं, मेरे बच्चे आज पटाखों मिठाइयों के लिए तरसे, ये एक बाप कैसे देख सकता है?, मैं सुबह से ही पैसे की जुगाड में घूम रहा था, लेकिन आज त्योहार के दिन किसी ने पैसे नहीं दिए मुझे, तब मैं एक किराने की दुकान पर गया और अपना रेडियो उसके यहां गिरवी रखा, उससे मसाले लिए और गांवों में घूम घूमकर बेचा , जब मेरे पास पैसा हो गया तो त्योहार का सारा सामान खरीदकर मैं घर लौट रहा था कि तभी मुझे याद आया कि आज के दिन लोग नए कपड़े पहनते हैं, मैं और मेरी बीवी भले ही फटेहाल रहें लेकिन कम से कम मेरी बेटियां ही आज के दिन नए कपड़े पहन लें, यह सोचकर मैंने अपनी घड़ी बेच दी और अपने दोस्त के कपड़े की दुकान से दो फ्रॉक लेकर आया, यही सब करते करते मुझे देर हो गई।
इतना कहते हुए पापा की आंखे भर आई।
मम्मी सजल नेत्रों से पापा को देख रही थी और पापा उन्हें,
इसके बाद हमारे घर में भी रोशनी के दिए जल उठे , पटाखे भी छूटे, हम दोनों बहनों ने फुलझड़ियां भी जलाई, मिठाई भी खाई, लेकिन पापा के मनपसंद रेडियो और घड़ी की कीमत पर।
लव यू पापा
संगीता शर्मा"

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