जब गिरी आसमाँ से ओस की बूंदे,
सर्द रातों का मौसम है आया।
जब खिला चाँद है ये शरद का,
सर्द रातों का मौसम है आया।

फूल खिलने लगे बाग में जब,
तितलियां भी ये उड़ने लगी है।
सूर्य की रोशनी की तरफ अब,
देखो सूरजमुखी भी मुड़ी है।

तन में भरने लगी अब है ठंडक,
उष्णता कम सी अब हो रही है।
जो भी भावों में थी नफ़रतें भी,
थोड़ी थोड़ी वो खत्म हो रहीं है।

बीती बातों को कभी याद करके,
अब रुदन का समय ही नहीं है।
सोच अब तो है अच्छे पलों को,
दिल उमंगों से ये भर रहा है।

पर्वतों पर है छाई अरुणिमा,
देखो नदियां भी कल कल बही है।
देख प्राकृत का सुंदर नज़ारा,
आत्मा भी पिघलने लगी है।



नाम - इंदु विवेक उदैनियाँ
शहर-उरई (जालौन)उत्तर प्रदेश