मेरे पिता मेरे जमीर है, पिता ही जागीर है
जिसके पास ये है वह दुनिया में सबसे अमीर है
कहने को तो सब ऊपर वाला देता है
पर खुदा का ही एक रूप पिता का शरीर हैं।।
माँ घर का गौरव तो पिता घर का अस्तित्व हैं
माँ के पास अश्रुधारा तो पिता के पास संयम का तीर है
जन्म अगर दिया है माँ ने पैरों पर चलना सिखाया
तो पिता ने पैरों पर खड़े होना सिखाकर दुनिया में पहचान दिलाया ।।
पिता संघर्ष की आँधियों में हौसलों की दीवार है
परेशानियों से लड़ने को वो दो धारी तलवार है
बचपन में खुश करने वाला बिछौना है
तो कभी परिवार की हिम्मत और विश्वास है मेरे पिता ही मेरी पहचान है।।
क्या लिखूं उनके लिए मेरे शब्द ही कम पड़ जाते हैं
अपनी सारी जिंदगी भी लुटा दें उनपर ,तो भी उनका कर्ज कहा चुका पाते हैं
ऊंगली पकड़ कर वो चलना सिखाते हैं गिरने पर अगर चोट लग जाए तो हमसे ज्यादा परेशान वो हो जाते हैं
वो पिता ही है जो अपने दर्द छुपाकर हर फर्ज निभाते।।
बेटी की शादी, बेटों को मकान
बहुओं की खुशियां, दामादो का मान
कुछ ऐसे ही सफर में गुजारे वो हर शाम
मुझको हिम्मत देने वाले वो मेरे है अभिमान।।
बेटीयों के भाग्यविधाता हैं पिता और बेटियां पिता की है परीयां
पिहर से ससुराल तक का सफर हंसकर तय वो कराते हैं
आंसू गिर जाए अगर बेटियों की आंखों से तो अपनी आत्मा से तड़प वो जाते है
उनके इस अकल्पनीय प्रेम की वजह से ही तो हर बेटी अपने भाग्य पर इतराती है
पिता सा जीवनसाथी पाने की ख्वाहिश आंखों में संजाती है।।

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