रसोई की खिड़की भी
करती है,इंतजार गृहिणी का
सदा रहती है ,जिनसे रौनक
प्यार परोसती,जो अपने हाथों का ✨
करे जिस भाव से,भोजन तैयार
कण कण में, बसता जैसे प्यार
रसोई की खिड़की भी होती खुश
जब तृप्त होता ,पूरा परिवार ✨
प्रातः काल से रात्रि तक
रहती हलचल ,जो सम्मुख मेरे
फरमाइशे ,सबकी पूरी करते
थके न कभी, सखी पांव तेरे ✨
मैं रसोई घर की खिड़की
निर्जीव हूं, पर अहसास जुड़े
मांनू तुझे मैं, अपनी सखी
इक -दूजे से, हमें ऐसे जुड़े ✨
मनीषा भुआर्य ठाकुर(कर्नाटक)

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