आधुनिकता की आड़ में
छूट गए घर के आँगन
लिविंग,डाइनिंग हॉल में
बदल गए घर के आँगन
बच्चों की किलकारी से
गुलजार थे कभी जो आँगन
सबके सुख-दुख साँझा करते
अम्मा-बाबूजी का जमता आसन
घर की अखंड एकता को दर्शाते
परिवार को सम्मान दिलाते आँगन
कभी -कभी घर की फूटन को
कर खड़ी दीवार, दिखाते आँगन
काल चक्र के खेल में उलझ
कटते-बंटते रहे घर के आँगन
होते छोटे-छोटे अब तो घर से
एकदम विलुप्त हुए आँगन।।
आशा झा सखी
जबलपुर (मध्यप्रदेश)

0 टिप्पणियाँ