मानवेंद्र ने माधव को मार डालने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी अगर दादी सा ने उनका हाथ नहीं पकड़ लिया होता।
दादी सा वैसे तो मानवेंद्र से डरती थी लेकिन यहां बात उनके चहेते नवासे की थी । जिसे वो बहुत प्यार करती थी उसके खिलाफ वो कैसे कुछ सुन सकती थी। उन्होंने मानवेंद्र का हाथ पकड़ लिया और कहा
"मनु, खबरदार जो माधव पर हाथ उठाया। आपने ऐसा सोच भी कैसे लिया? हम अपने नवासे को अच्छी तरह जानते हैं। वो इतनी ओछी हरकत कभी नहीं कर सकता।ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती । जरूर संयोगिता भी माधव को पसंद करती हैं। तभी वो उसके कमरे में आई थी।"
"दादी सा आप ये कैसी बात कर रही हैं? हम इन्हें बिलकुल पसंद नहीं करते। और हम इनसे विवाह नहीं करना चाहते। आप सब हमारी बात का विश्वास क्यों नहीं कर रहे। भाई सा आप तो हमारी बात सुनिए।" संयोगिता कभी दादी सा के सामने तो कभी मानवेंद्र के सामने रो रो कर अपनी सफाई दे रही थी। मानवेंद्र ने उसके सिर पर हाथ फेरा और कहा
"दीदी, हमें आपकी बातों पर पूरा विश्वास है। और अगर आप माधव से विवाह नहीं करना चाहती तो हम नहीं करेंगे। आप बिल्कुल चिंता न करें। इस माधव को तो हम देख लेंगे। उसने एक राजपूत की बहन छूने की कोशिश की है , इसका अंजाम बहुत भयानक होगा। "
माधव ने तभी पैंतरा बदला और दादी सा के पैर पकड़ लिए और गिड़गिड़ाते हुए बोला
"नानी सा, हम संयोगिता से बहुत प्रेम करते हैं। आज से नहीं बचपन से ही ये हमें बहुत अच्छी लगती है। संयोगिता सही कह रही हैं। हमारे पेट दर्द की खबर सुनकर ही ये हमारे पास हमारे कमरे में आई थी। लेकिन इन्हें देखकर हम अपनी भावनाओं पर नियंत्रण नहीं रख सके।और इन्हें गले लगा लिया। हमने बहुत बड़ी गलती की है नानी सा। हमें आप जो चाहे सजा दीजिए, परंतु हमारी संयोगिता को कुछ मत कहिए। ये बहुत ही अच्छी हैं। और हमने इनसे सच्चे हृदय से प्रेम किया है। इनके बिना हम नहीं रह सकते हैं। नानी सा, हम कल ही इस हवेली से बहुत दूर चले जायेंगे क्योंकि इनके बिना तो अब हमारा जीवन असंभव है।"
"मनु, तुम मेरे छोटे भाई की तरह हो, तुम्हारा मुझ पर क्रोध करना एकदम सही है। आखिर कौन सा भाई अपनी बहन की इज्जत के लिए नहीं बोलेगा। लेकिन मनु, सच मानो हमारे मन में संयोगिता के लिए बहुत सम्मान है। हमने उन्हें अपने हृदय की रानी बनाने का फैसला किया है । हम तुम्हें पूरा विश्वास दिलाते हैं कि उन्हें हम अपनी पलकों में बिठा कर रखेंगे। उनकी हर इच्छा पूरी करेंगे। उनके प्रति हम पूर्ण रूप से समर्पित रहेंगे।हम भी राजपूत हैं और एक राजपूत अपने वचन की आन रखने के लिए अपने प्राण भी दे सकता है। बस हमारी संयोगिता का हाथ हमारे हाथ में दे दो।"
मानवेंद्र माधव का यह रूप देखकर आश्चर्य चकित हो गए। उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि वो अब माधव को उसके कृत्य के लिए फटकारे या उसकी इस बात पर विश्वास करें। वो कभी संयोगिता को देख रहा था तो कभी माधव की तरफ। गिरगिट की तरह रंग बदलते माधव को देखकर मानवेंद्र उसकी असलियत को पहचान नहीं सका।उसने दादी सा की ओर प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा। तब दादी सा ने मानवेंद्र से कहा।
"मनु, माधव की आंखों में हमें सच्चाई दिख रही है। भले ही आपको उन पर विश्वास न हो पर हमें अपने नवासे पर पूरा विश्वास है। उन्हें देखकर ही ऐसा लग रहा है कि वो सच बोल रहे हैं। हमें खुशी है कि माधव ने अपने हृदय की भावनाओं को हमारे सामने रखा। और अब हम भी चाहते हैं कि संयोगिता और माधव को विवाह के बंधन में बांध दिया जाए। आखिर संयोगिता अपने ही लोगों के बीच में रहेगी। हमारी पगड़ी भी गैर लोगों के सामने नहीं झुकेगी।"
मानवेंद्र ने दादी सा से कुछ भी नहीं कहा।वो सोच में पड़ गया।उसने दादी सा के कहने पर माधव को छोड़ दिया । तभी गांव से एक आदमी उसी बलात्कारी के संबंध में कुछ खबर लेकर आया। नौकरानी का संदेश पाकर मानवेंद्र हवेली के बाहर निकल आया जहां वो गांव के लोगों से मिलता था। माधव भी घबरा कर उसके साथ हो लिया कि कहीं किसी गांव वाले ने हमें देख तो नहीं लिया ।
वैसे माधव कोई डरने वाला आदमी नहीं था। उसके अपने गांव में उसका दबदबा था। वो खुलेआम लोगों पर जुल्म करता था , और डर के मारे कोई भी मुंह नहीं खोलता था। औरतें उसके डर से अपने घरों के बाहर नहीं निकलती थी । वो खुले सांड की तरह इधर उधर मुंह मारता रहता था ,लेकिन यहां यह बात कोई नहीं जानता था। माधव को संयोगिता से किसी भी कीमत पर विवाह करना था इसलिए वह अपने आपको सबकी नजरों में गिराना नहीं चाहता था । गांव में भी कोई नहीं जानता था कि जिसने उस औरत की अस्मत लूटी थी,वो कोई और नहीं माधव ही था।
मानवेंद्र उस आदमी से पूछताछ करने लगा। वो आदमी माधव को देखकर सोच में पड़ गया। और उसे पहचानने कोशिश करने लगा। ये माधव की खुशकिस्मती थी कि वो उसे पहचान नहीं पाया। वो हाथ में कुछ लेकर आया था जिसे देखकर माधव घबरा गया । और उसने मानवेंद्र का ध्यान उस चीज से हटाने के लिए उसे आवाज दी।
मानवेंद्र ने माधव की ओर देखा और गुस्से से कहा
"क्या बात है माधव भैया? अब क्या हो गया? आप अंदर दादी सा के पास चलिए हमें अभी एक मामले को देखने गांव जाना है। हम वहां से लौटकर आपसे बात करते हैं। अभी बात खत्म नहीं हुई है।"
हम ये कह रहे थे कि मनु, कि गांव जाने से पहले अगर हम लोग भोजन कर लेते तो अच्छा रहता। बैठक से कई बार बुलावा आ चुका है।
"नहीं, जब तक यह मामला सुलझ नहीं जाता हमारी परेशानी बढ़ी रहेगी , हम गांव से लौटकर खाना खाते हैं। आप दादी सा को बुला लें,वो भोजन पर आपका साथ देंगी। माधव भैया, हमें विश्वास है कि आप हमारी बात समझेंगे। "
"और हां....एक बात और ..…"
क्रमशः
संगीता शर्मा

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