मुझे यकीन है वो आएगा ,
लगाने मेरे जख्म पर मरहम ,
मेरे जख्मो को थोड़ा हरा रहने दो।

खुशियों इतना न हँसाओ ,
जो भूल जाऊँ उसे ,
थोड़ा दर्द मेरे दिल मे दबा रहने दो।

इस शर्म से सुर्ख अक्स का,
दीवाना है वो यही सोचके ,
न उठाएं पलकें हम, इन्हें यूँ ही झुका रहने दो।

सुबह का इंतजार होता सबको ,हमें भी है,
पर उनकी याद जिनमें है शामिल,
उन शुर मई शामों का थोड़ा थोड़ा निशां रहने दो।

हकीकत की सर जमी मेरी तुम सारी ले लो,
कोई मसला न होगा हमको ,
पर ख़्वाबों के बयाबान में उसका गुमाँ रहने दो।

सबके लिए है मेरा हर पल हाजिर ,
जिए भी न कभी आम खुदको चाहकर,
उसके वास्ते एक पहर की दुआ रहने दो।

  किसकी तलाश है कोई सवाल न करो ,
बस यही कहना खो गया मेरा बजूद कहीं,
उसे ढूढने की खुद से इल्तजा रहने दो।

तमाम उम्र तुम्हारे वास्ते कोई गम नहीं,
बस मेरी ख़्वाहिश जहाँ परिबाज भरे,
मेरे सपनों की उड़ानों को थोड़ा आशमा रहने दो।

इतने भी बुरे नही है हम बस थोड़े हाजिर जबाब हैं,
इस आदत को बेबफाई का इल्जाम न दो अपने दिल मे हमारे वास्ते थोड़ी बफा रहने दो।


अब कोई तलाफ़ी की हमसे उम्मीद न कर दुनिया,
स्वाभिमान  में गिरावट कतई मंजूर नही अंजुम,
नही डरते,सर उठा कर जीना गुनाह है तो गुनाह रहने दो।

क्या करेंगे झूठी दलीलों से जमाने की नजर में उठकर,
रह जाएंगे  एक नुमाइश का मंजर बनकर,
बड़ा नही बनना हमको हमारी नजरों में खुदा रहने दो।

जमाने भर के सायबान,नहीं बस साथ हमसफ़र काफी हैं,
जन्नत की ख़्वाहिश होगी किसी को मेरा घर मेरी जन्नत है,
मेरे सर पर माँ पापा की वह दुआ रहने दो।
अन्जू दीक्षित,
बदायूँ,उत्तर प्रदेश।