पतित पावनी गंगा का स्नान करें,
चलो कुछ समय प्रभु का ध्यान करें।
पुरखों को तारने भागीरथ गंगा को ले आए ,
जीते जी हम अपने बड़ों का सम्मान करें।
शिव की जटाओं से होती है प्रकट भव्य गंगा,
शिव की तरह अपमान का विषपान करें
ना मुक्ति मिल पाएगी कभी दुनिया के कामों से,
आज तो कुछ जप, तप और दान करें ।
पाप खत्म नहीं होंगे केवल गंगा स्नान से ,
मन की शुद्धि की तरफ भी तो थोड़ा सा ध्यान धरें।
मन चंगा तो कठौती में गंगा निश्चित है 'सीमा ',
इस सूक्ति को अमल और आसान करें।
स्वरचितसीमा कौशल
यमुनानगर हरियाणा

0 टिप्पणियाँ