मेरा पारिजात , मेरा कल्पतरु , मेरा हार सिंगार । 
मेरे आँगन का श्रृंगार  ।

झरते सुमन पारिजात के , रुक्मिणी , कृष्ण , कुन्ती की याद दिलाते ।
गुरू - ज्ञान याद दिलाए , पुष्प पारिजात के तोड़े नहीं जाते ।
झरे हुए अवनि से संचित  , पुष्प प्रभु को अर्पित किए जाते ।
हर्षित मन , महका घर-आँगन , नव - जीवन का संचार । 
मेरा पारिजात , मेरा कल्पतरु , मेरा हार सिंगार ।
मेरे आँगन का श्रृंगार । 

झर - झर झरते श्वेत पुष्प आँगन को महकाएँगे ।
मौसम के रंग बदलते ही रात चाँदनी छिटकाएँगे  ।
फिर से नव पल्लव आएँगे , हरे भरे हो जाएँगे  ।
नव - जीवन , नव - प्राण का संदेशा जग में फैलाएँगे  ।
प्रकृति का अनुपम सौन्दर्य , धरा का सुगन्धित उपहार ।

मेरा पारिजात , मेरा कल्पतरु , मेरा हार सिंगार ।
मेरे आँगन का श्रृंगार  । 

एक बार फिर पूरा होगा मेरे घर - आँगन का श्रृंगार  ।
महक उठेगा मेरा घर - आँगन और मेरा हार सिंगार  ।
ऐसा मेरा हार सिंगार । मेरे घर - आँगन का श्रृंगार  ।

मीरा सक्सेना माध्वी 
नई दिल्ली