छोड़कर एक घर की दहलीज
दूसरे घर के दहलीज की ओर चली
छूट गई उस घर की दहलीज
जहां थी मैं पली-बढ़ी
कैसे छोड़ दूं मैं वह दहलीज
जहां जब जी चाहा मेरा, बिना पंख के ही उड़ी
आंखों में लेकर आंसू
मन में कुछ कसक लिए
पकड़े अपने पिया का हाथ
मैंने सब से विदा लिए
अब शुरू हुई मेरी नई कहानी
नए रिश्ते नई जिम्मेदारी
ईश्वर को करके प्रणाम
मैंने दहलीज पार किया
अब दो घरो की इज्ज़त थी मेरे हाथ,
डरती थी खुद से कहीं बिगड़े ना कोई बात
धन्यवाद
सत्येंद्र पाण्डेय 'शिल्प'
गोंडा उत्तरप्रदेश

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